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विरोध को जगह देकर ही चल पाएगा यह लोकतंत्र

बद्री नारायण प्रोफेसर, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान

लोकतंत्र का विस्तार और उसका गहन होना इस बात पर टिका होता है कि वह कितने संवेदनशील ढंग से अपने समाज व जनता की असहमतियों, उनके प्रतिरोधों को सुनता-समझता है, उनसे संवाद करता है, उन्हें अपनी नीतियों, अपने नियमों और कार्यों में जगह देता है। बुधवार को सर्वोच्च न्यायालय ने पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी के मामले में एक महत्वपूर्ण सुझाव टिप्पणी के रूप में सरकार को दिया है। अदालत ने कहा है कि असहमतियों और विरोधों को जगह दें, नही तो असंतोष इकट्ठा होकर वैसे ही फट सकता है, जैसे ज्यादा देर बंद करने पर प्रेशर कुकर फट जाता है। यह चेतावनी और सुझाव लोकतंत्र के लिए बहुत मूल्यवान है। वाद-विवाद, संवाद, असहमतियां, प्रतिरोध सबको सुनकर, समझकर, जगह देकर ही लोकतंत्र शक्तिवान होता है। नहीं तो उसका विकास जड़ हो जाता है, जो आगे चलकर सत्ता के लोकतांत्रिक रूप को ही नुकसान पहुंचाता है। समाज वैज्ञानिक और लोकतंत्र के विचारक इस बात को हमेशा से कहते रहे हैं। यह एक ऐसा सुझाव है, जिसे जनता के वोटों से सत्ता में पहुंचने वाले वर्ग को गांठ बांध लेना चाहिए।

भारतीय लोक समाज में तो विशेष रूप से ऐसे लोक उत्सव, लोक अवसर और लोक क्षण बनाए गए हैं, जहां जनता अपने शासकों, मालिकों और सत्ता के विरुद्ध अनेक रूपों में प्रतिरोध दर्ज कराती है और शासक समुदाय उन्हें कहने, सुनने व प्रदर्शित होने का मौका देता है। प्रसिद्ध संस्कृतिवेत्ता मिखाइल वारब्तीन ने ऐसे लोक त्योहारों को समाज के लिए सेफ्टी वॉल्व कहा है, जिसके कारण समाज में विभिन्न समुदाय अपना विरोध, प्रतिरोध और शिकायत दर्ज कराकर भी सहअस्तित्व में रहते हैं। भारतीय समाज में प्रचलित अनेक लोकगीतों, मुहावरों में अपने शासकों और आधिपत्य वाले तबकों के प्रति प्रतिरोध का भाव व्यक्त होता रहता है। ऐसे ही प्रतिरोधों को अपने में जगह देकर भारतीय समाज समाहारी और समरस बन पाता है। 

आज के दौर में बहुत सी चीजें बदलने लगी हैं। हम दिन-ब-दिन सर्विलेंस समाज की तरफ बढ़ रहे हैं। आज दफ्तरों, मुहल्लों, कॉलोनियों, यहां तक कि सड़कों को भी सुरक्षा के लिए सीसीटीवी लगाने की जरूरत पड़ रही है। अभिव्यक्ति के खतरे बढ़ते जा रहे हैं। सुरक्षा की दृष्टि से बायोमेट्रिक्स लगाने का चलन बढ़ रहा है। मशहूर सामाजिक-राजनीतिक चिंतक अगम्बेन ने एक बार सड़क पर छात्रों के साथ खड़े होकर सीसीटीवी लगाने का विरोध किया था। वह मानते थे कि इसके पीछे की धारणा यही दिखती है कि हम अपने हरेक नागरिक को संभावित अपराधी मानते हैं। ये तरीके दुधारी तलवार की तरह होते हैं। इनसे अपराध पर नियंत्रण तो होता है, पर हम प्रतिरोध की आवाज भी दबाते हैं। एक ही तकनीक का सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों तरह से उपयोग किया जा सकता है। महत्वपूर्ण यह देखना होता है कि किस तरह की मंशा इनका उपयोग कर रही है?

वैसे तो सर्विलेंस शासन तंत्र का एक तत्व होता है। भारतीय राज्य शासन का इतिहास अगर देखें, तो कौटिल्य ने अपने शासन तंत्र की जो संकल्पना की थी, उसमें भी सर्विलेंस की महत्वपूर्ण भूमिका थी। पर उन्होंने इसका उपयोग अपनी प्रजा के असंतोष और प्रतिरोध को सुनने के लिए भी किया था। प्राचीनकाल में भी जिस राजसत्ता ने प्रतिरोध को सुना, वह सफल और सार्थक हुई। जहां शासक या सत्ता सुनना बंद कर देती है, वहीं समस्याए पैदा होने लगती है। शासन और शासक के लिए सुनने की कला विकसित करने की जरूरत आज और भी बढ़ती जा रही है।

एक अध्ययन के दौरान बनारस के पास मुसहर जाति के एक वृद्ध ने अत्यंत कातर आंखों से एक बार हम लोगों से कहा था- जो अफसर, मालिक, मुख्य लोग हैं, वे या तो हमें ठीक से सुनते नहीं; सुनते हैं, तो समझते नहीं; समझते हैं, तो उल्टा ही करते हैं। हमें सत्ता और जनता के बीच बढ़ती इस खाई को महसूस करना ही होगा। और यह संभव है, लोकतंत्र में वाद, विवाद और प्रतिरोधों को ठीक से सुन-समझकर और जगह देकर। प्रतिरोध की भी अपनी मर्यादा और सीमाएं होती ही हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:GB Pant Social Science Institute Professor Badri Narayan article in Hindustan on 31 august