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जल संकट के समाधान की ओर बढ़ने का समय

इससे बुरी स्थिति और क्या हो सकती है कि मानसून के मौसम में पूरा देश जल संकट पर चर्चा के लिए मजबूर है। इस समय देश की राजधानी दिल्ली सहित कोई महानगर, शहर, कस्बा और गांव ऐसा नहीं है, जो पीने के पानी के...

जल संकट के समाधान की ओर बढ़ने का समय
ज्ञानेंद्र रावत, पर्यावरण कार्यकर्ताFri, 22 Jun 2018 10:31 PM
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इससे बुरी स्थिति और क्या हो सकती है कि मानसून के मौसम में पूरा देश जल संकट पर चर्चा के लिए मजबूर है। इस समय देश की राजधानी दिल्ली सहित कोई महानगर, शहर, कस्बा और गांव ऐसा नहीं है, जो पीने के पानी के संकट का सामना न कर रहा हो। कहीं मटका फोड़ प्रदर्शन हो रहे हैं, कहीं पानी के लिए मारा-मारी हो रही है। नीति आयोग ने अपनी रिपोर्ट में चिंता जाहिर की है कि देश में इस समय करीब साठ करोड़ आबादी पानी की समस्या से जूझ रही है। देश के तीन चौथाई घरों में पीने का साफ पानी तक मयस्सर नहीं। भारत दुनिया में जल गुणवत्ता के मामले में 122 देशों की सूची में 120वें नंबर पर है। दिक्कत यह है कि इस मामले में हमारे पास उम्मीद की कोई किरण भी नहीं है। 

समस्या का सबसे बड़ा कारण है कि हमारे पास जल संचय के भरोसेमंद और सबकी जरूरतें पूरी करने वाले साधन नहीं हैं। जो परंपरागत साधन और तरीके थे, उन्हें हमने आधुनिकता की दौड़ में खत्म कर दिया और नए विकल्प तैयार नहीं किए। नतीजा यह है कि हम खेती-किसानी और उद्योगों से लेकर दैनिक जरूरतों तक के लिए पूरी तरह भूजल पर निर्भर होते जा रहे हैं। भूजल दोहन के मामले में हमने चीन व अमेरिका तक को पीछे छोड़ दिया है। हम चीन व अमेरिका से 124 प्रतिशत यानी दोगुने से भी अधिक 250 घन किलोमीटर भूजल का दोहन करते हैं, जबकि अमेरिका और चीन 112 घन किलोमीटर सालाना भूजल का दोहन करते हैं। सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड द्वारा लोकसभा में दी गई जानकारी के अनुसार, बीते दस वर्षों में भूजल स्तर में 61 फीसदी की कमी आई है। इससे पारिस्थितिकी तंत्र के असंतुलन की स्थिति पैदा हो गई है। 2011 में समूची दुनिया के भूजल का 25 फीसदी अकेले हमारे देश में था। तमाम अनुमान बता रहे हैं कि 2020 तक दिल्ली, हैदराबाद सहित देश के 21 शहरों में भूजल समाप्त हो जाएगा और दस करोड़ आबादी के लिए मुसीबतें खड़ी हो जाएंगी। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, 2020 तक हमारा देश जल संकट वाला राष्ट्र बन जाएगा। एक आकलन यह भी है कि आने वाले 32 साल में जल संकट के कारण देश के सकल घरेलू उत्पाद को छह फीसदी का नुकसान उठाना पडे़गा। हमारे यहां पानी की मांग और उपलब्धता में काफी अंतर है। इसमें बढ़ती आबादी ने प्रमुख भूमिका निभाई है। देखा जाए, तो आज से 10 साल पहले यानी 2008 में देश में 634 अरब घन मीटर पानी की मांग के मुकाबले 650 अरब घन मीटर उपलब्धता थी। साल 2030 तक पानी की उपलब्धता केवल 744 अरब घन मीटर रह जाएगी, जबकि मांग होगी 1,498 अरब घन मीटर, यानी दुगने से भी ज्यादा।  

 जिस देश में भूतल व विभिन्न सतही साधनों से पानी की उपलब्धता 2,300 अरब घनमीटर है और जहां नदियों का जाल बिछा हो, सालाना औसत वर्षा 100 सेंटीमीटर से भी अधिक होती है, जिससे 4,000 अरब घनमीटर पानी मिलता हो, नदियों से 1,869 घन किलो मीटर, कुओं व तालाबों से 690 घन किलोमीटर और भूजल से 433 घन किलोमीटर मिलता हो, वहां पानी का अकाल क्यों है? दरअसल,वर्षा से मिलने वाले जल में से 47 फीसदी यानी 1,869 अरब घन मीटर पानी नदियों में चला जाता है। इसमें से 1,132 अरब घनमीटर पानी उपयोग में लाया जा सकता है, पर इसमें से भी 37 फीसदी उचित भंडारण-संरक्षण के अभाव में समुद्र में बेकार चला जाता है, जिसे बचाया जा सकता है। 

हमारी जल नीति में न तो भूजल रिचार्ज प्रणाली को कोई मान्यता दी गई है और न ही इनको किसी प्रकार का कोई संरक्षण मिला है। उस स्थिति में, जब भूजल रिचार्ज के मुकाबले 62 फीसदी अधिक खपत है। यह खतरनाक संकेत है। वर्षा जल संरक्षण तभी संभव है, जब जोहड़ों, तालाबों के निर्माण की ओर विशेष ध्यान दिया जाए। पुराने तालाबों से अतिक्रमण हटवाया जाए, उनको पुनर्जीवित किया जाए। खेतों में सिंचाई हेतु पक्की नालियों का निर्माण किया जाए, अन्यथा पीवीसी पाइप का उपयोग हो। बहाव क्षेत्र में बांध बनाकर उसे इकट्ठा किया जाए, ताकि वह समुद्र में बेकार न जा सके। लेकिन इस मानसून में क्या हम यह प्रक्रिया शुरू करेंगे? (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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