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बढ़ती कारों का काफिला रोक कर ही बढ़ेगी हमारी रफ्तार

जयंतीलाल भंडारी, अर्थशास्त्री

इन दिनों दुनिया भर में भारत के शहरों में बढ़ती हुई कारों से बढ़ते हुए पेट्रोल-डीजल के उपभोग, बढ़ते ट्रैफिक जाम और बढ़ते प्रदूषण पर लगातार अध्ययन और रिपोर्ट प्रकाशित हो रही हैं। नीति आयोग ने भी इसे लेकर एक रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें ज्यादा प्रदूषित शहरों में निजी कारों के इस्तेमाल पर उपयोग सरचार्ज यानी कंजेशन शुल्क लगाने की सिफारिश की गई है। आयोग को उम्मीद है कि इससे निजी वाहनों का इस्तेमाल कम होगा और प्रदूषण घटेगा। विश्व बैंक की नई रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के शहर कारों की बढ़ती संख्या से पैदा हो रही परेशानियों से निपट पाने में सक्षम नहीं हैं। दूसरी तरफ विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, कानपुर, फरीदाबाद, गया, वाराणसी, पटना, दिल्ली, लखनऊ, आगरा, गुरुग्राम व मुजफ्फरपुर भारत के 10 सबसे प्रदूषित शहर हैं। यहां प्रदूषणजन्य बीमारियां लगातार बढ़ रही हैं। विज्ञान एवं पर्यावरण मंत्रालय से संबद्ध संसदीय समिति के अनुसार, दिल्ली में शहरीकरण और बढ़ते वाहनों के प्रदूषण से 2013 से 2017 के बीच 17 लाख लोग सांस की बीमारी के शिकार हुए हैं। 

इस समय दुनिया के विकासशील देशों में सबसे अधिक कारें भारत में हैं। जुलाई 2018 के अंत में देश की सड़कों पर लगभग ढ़ाई करोड़ कारें दौड़ रही थीं। देश में प्रतिमाह करीब दो लाख से अधिक कारों की बिक्री हो रही है। देश में जहां कारों का ढेर लगता जा रहा है, वहीं देश में बसों की संख्या बहुत कम है। देश में करीब 19 लाख 70 हजार बसें हैं। इनमें से 18 लाख  30 हजार निजी क्षेत्र में और 1 लाख 40 हजार सरकारी क्षेत्र में हैं। क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल के आकलन के अनुसार, छोटी कारों की कम कीमत तथा सरलता से उपलब्ध बैंक लोन के कारण दोपहिया से उठकर चार पहिया वाहन की सवारी करने के इच्छुक लोगों की संख्या बढ़ती ही जा रही है। हालत यह है कि इसके कारण सड़कें अक्सर जाम रहती हैं और पार्किंग में आमतौर पर जगह नहीं मिलती। 

अब हमें तय करना है कि हम वर्तमान पीढ़ी को कैसा पर्यावरण देना चाहते हैं और अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए कैसी विरासत छोड़ते हैं। स्पष्ट है कि कारें भारतीय सामाजिक जीवन का भविष्य नहीं हो सकती हैं। इसलिए देश के सभी शहरों में सार्वजनिक परिवहन की कारगर व्यवस्था पर विचार मंथन जरूरी है। इस समय देश में पांच हजार छोटे-बड़े शहरों में से एक प्रतिशत शहरों में भी सार्वजनिक परिवहन की भरोसेमंद और पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। शहरी यातायात नियोजन विभाग की एक रिपोर्ट के अनुरूप हमारे देश में दिल्ली और बेंगलुरु के 27 फीसदी कामकाजी और लखनऊ के केवल 11 फीसदी कामकाजी लोग ही काम पर जाने के लिए सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते हैं, जबकि दुनिया के अधिकांश विकसित और विकासशील देशों में सार्वजनिक परिवहन प्रणाली से आने-जाने वालों की संख्या इससे कहीं ज्यादा है। लंदन में 45 फीसदी और सिंगापुर में 59 फीसदी लोग सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था का ही उपयोग करते हैं। 

हम सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की बेहतरी और प्रदूषण से मुक्ति के लिए दुनिया के कई बड़े शहरों से सबक ले सकते हैं। लंदन में इसके लिए  2003 से कारों पर कंजेशन चार्ज लगाने की शुरुआत हुई और अब वहां हर कार पर प्रतिदिन 1,025 रुपये चुकाने पड़ते हैं। स्वीडन के स्टॉकहोम, इटली के मिलान तथा सिंगापुर में भी कंजेशन चार्ज लगता है। हमारे देश में, खासतौर से प्रदूषित एवं ट्रैफिक जाम से बेहाल शहरों में सड़कों पर चलने वाली निजी कारों पर कर वसूला जाना चाहिए। नीति आयोग ने भी यही कहा है कि ऐसे विकल्पों पर तुरंत काम करना शुरू कर दिया जाना चाहिए, ताकि देश भर में वर्ष 2022 तक ज्यादा प्रदूषण वाले शहरों में हर जगह पहुंच सकने वाला इलेक्ट्रिक ट्रांसपोर्ट शुरू किया जा सके। हालांकि पूरे देश में इसकी शुरुआत इतनी आसान नहीं है। नीति आयोग की सिफारिशों को जमीन पर उतारने के लिए जिस इच्छाशक्ति की जरूरत है, वह फिलहाल कहीं दिख नहीं रही। न इस पर बहुत चर्चा ही हो रही है। (ये लेखक के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:Economist Jayantilal Bhandari article in Hindustan on 06 september