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अगर लेहमन ब्रदर्स की जगह लेहमन सिस्टर्स होती

अलका आर्य, वरिष्ठ पत्रकार

पिछली वैश्विक आर्थिक मंदी को दस साल गुजर चुके हैं, इसलिए यह विश्लेषणों का दौर है। वित्तीय क्षेत्र का हर माहिर इसके कारणों का विश्लेषण कर रहा है। वह भविष्य की आशंकाएं बता रहा है और कई किस्म के निदान भी सुझा रहा है। आर्थिक मामलों के वे सारे पंडित सक्रिय हो गए हैं, जिन्हें पिछली बार मंदी की भनक भी लग नहीं पाई थी। लेकिन इन सबमें इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड यानी आईएमएफ की प्रमुख क्रिस्टीन लेगार्ड की मंदी को लेकर एक अलग ही व्याख्या है। उन्होंने दुनिया को आगाह किया है कि बैंकिंग क्षेत्र में पुरुषों के वर्चस्व के कारण फिर से आर्थिक मंदी आ सकती है। उनका कहना है कि 10 साल पहले लेहमन ब्रदर्स के दिवालिया होने की बड़ी वजह भी यही थी। अपने ब्लॉग में वह लिखती हैं कि अगर लेहमन ब्रदर्स की जगह लेहमन सिस्टर्स होतीं, तो आज दुनिया कुछ और होती। क्रिस्टीन लेगार्ड ने लेहमन सिस्टर्स वाले सवाल को उठाकर दुनिया की दिग्गज अर्थव्यवस्थाओं और नीति-निर्माताओं का ध्यान इस ओर खींचा है कि अर्थव्यवस्था या बाजार में पुरुषों के वर्चस्व का खामियाजा आम आदमी को चुकाना पड़ता है। लिहाजा उनका जोर इस बात पर है कि मर्दाना छवि को तोड़ने व अर्थव्यवस्था में निरंतर सुधार के लिए फाइनेंस सेक्टर में महिला नेतृत्व को बढ़ाना होगा।  

देखा जाए, तो वैश्विक आर्थिक मंदी के 10 साल के बाद भी यह मुद्दा प्रासंगिक है, जिसने सितंबर 2008 के फौरन बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया में सुर्खियां बटोरी और शोध संस्थाओं ने इस पर अध्ययन कराने के लिए लाखों डॉलर जुटाए। दावोस में 2009 में आयोजित विश्व आर्थिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) की सालाना बैठक में ‘विश्व अर्थव्यवस्था के पुनर्निर्माण में महिला शक्ति का इस्तेमाल’ नामक विषय पर एक रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें लेखकों की ओर से यह राय व्यक्त की गई कि हालांकि मौजूदा वित्तीय संकट का कोई त्वरित हल नहीं हो सकता, लेकिन निश्चित तौर पर एक दीर्घावधि हल हो सकता है। इसके लिए महिलाओं को नेतृत्व का पद हासिल करने के लिए अधिक से अधिक अवसर मुहैया कराने और बदलती अर्थव्यवस्था के दौर में नए दृष्टिकोण को सुनने के लिए उचित माहौल बनाने की जरूरत है। विश्व आर्थिक फोरम के संस्थापक सदस्य व चेयरमैन क्लॉस श्वाब ने भी इस मौके पर कहा कि सरकारी संस्थाओं और वित्तीय संस्थाओं में महिलाओं को वरिष्ठ पदों पर कमान संभालने के मौके देना न सिर्फ मौजूदा आर्थिक उथल-पुथल के हल तलाशने के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भविष्य में भी आर्थिक मंदी की आशंका आने पर ये प्रयास मददगार साबित होंगे। 

महत्वपूर्ण वित्तीय संस्थानों में प्रभावशाली पदों पर महिलाओं की तादाद को बढ़ाने के पीछे एक दलील यह भी दी जाती है कि महिलाएं कम जोखिम वाले फैसले लेती हैं, नुकसान के प्रति अधिक गंभीर होती हैं, पुरुषों की तरह अति-आत्मविश्वासी नहीं होंती और उनका रुझान लंबी अवधि उन्मुख योजनाओं के प्रति ज्यादा होता है। वैसे भी यह देखा गया है कि अधिक विविधता सोच को गहरा करती है। हालांकि वित्त व्यापार को लेकर आम धारणा यही है कि ये विषय व इनसे संबंधित क्षेत्रों की समझ महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में अधिक होती है और वे अर्थशास्त्र से जुड़े जटिल हालात का बेहतर ढंग से आकलन करने में सक्षम होते हैं। ब्रिटेन के चार दिग्गज बैंकों के सीईओ पुरुष हैं। द फाइनेंशियल टाइम्स  के अनुसार, 100 बड़ी कंपनियों के बोर्ड में महिला निदेशकों का अनुपात गिरता जा रहा है। फॉर्चून-500 कंपनियों में 2018 में अब तक महिला सीईओ की संख्या 28 रह गई है, जबकि 2017 में इनकी संख्या 32 थी। मंदी के बाद महिला नेतृत्व की भूमिका वाला मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खूब जोर-शोर से तो उठा, मगर एक दशक के बाद भी पुरुषों के दबदबे वाले क्षेत्र में महिला नेतृत्व को लेकर कई किंतु-परंतु बरकरार हैं। इससे निपटने के लिए क्लास रूम में अर्थशास्त्र की पढ़ाई के लिए अधिक से अधिक लड़कियों को प्रोत्साहित करने वाला माहौल बनाने की दिशा में सार्थक पहल तो करना होगा, साथ-साथ बोर्ड रूम में अधिक से अधिक सक्रिय महिला निदेशकों पर भी फोकस करना होगा। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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  • Web Title:alka arya Article in Hindustan on 17 September