
मेडिकल सीटों से अधिक छात्रों की गुणवत्ता बढ़ाना जरूरी
साल 2047 तक भारत को एक विकसित देश बनाने के राष्ट्रीय संकल्प को पूरा करने के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य का कायापलट बहुत जरूरी है। पिछले सात दशकों में मेडिकल शिक्षा का बहुत विस्तार हुआ है, किंतु अब भी यह न तो देश की…
हरिवंश चतुर्वेदी, महानिदेशक, आईआईएलएमबीएस
साल 2047 तक भारत को एक विकसित देश बनाने के राष्ट्रीय संकल्प को पूरा करने के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य का कायापलट बहुत जरूरी है। पिछले सात दशकों में मेडिकल शिक्षा का बहुत विस्तार हुआ है, किंतु अब भी यह न तो देश की आवश्यकताओं के अनुरूप है और न ही विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों को पूरा करती है।
पिछले हफ्ते चिकित्सा संस्थानों में सीटों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) के नए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2024-25 के लिए 1,37,600 एमबीबीएस सीटें स्वीकृत हो चुकी हैं और कुल मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़कर 816 तक पहुंच गई है। जबकि, पिछले दशक में संख्या इससे बहुत कम थी। जैसे, वर्ष 2013-14 में एमबीबीएस सीटें 51,348 थीं। पोस्ट ग्रेजुएशन, यानी एमडी, एमएस, डिप्लोमा सीटों में भी बढ़ोतरी हुई है। साल 2014 के बाद से यह लगभग 31,000 से बढ़कर 73,157 तक पहुंच चुकी है। डेंटल चिकित्सा के क्षेत्र में भी बीडीएस और एमडीएस की सीटें बढ़ाई गई हैं। यह बढ़ोतरी इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में हर साल चिकित्सा शिक्षा में दाखिले के लिए लाखों विद्यार्थी नीट परीक्षा में बैठते हैं। हालांकि, सीटें जितनी तेजी से बढ़ाई गई हैं, चुनौतियां भी उसी तरह उभरकर सामने आई हैं। जैसे, दाखिले के लिए जबर्दस्त प्रतिस्पर्द्धा बनी हुई है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि संख्या बढ़ने के बावजूद गुणवत्ता उस कदर नहीं बढ़ सकी है। डेंटल शिक्षा में भी इसी तरह की चुनौतियां हैं। यहां तीन ऐसे क्षेत्रों का जिक्र किया जा सकता है, जहां यदि ठोस रणनीति न बनाई गई, तो आगे चलकर देश के स्वास्थ्य शिक्षण ढांचे की नींव कमजोर पड़ सकती है।
मेडिकल कॉलेज और उनकी सीटों में वृद्धि होती जा रही है, लेकिन बुनियादी ढांचा, क्लिनिकल अनुभव और शोध-संस्कृति के स्तर पर संस्थान तैयार नहीं हो सके हैं। कुछ नए कॉलेजों में तो पर्याप्त संख्या में रोगी ही नहीं आते या उनमें विशेषज्ञ विभागों का पूरी तरह से विकास नहीं किया गया है। इसके कारण सीटें बढ़ने के बावजूद चिकित्सा छात्रों के अनुभव नहीं बढ़ रहे। यदि चिकित्सा स्रातक अच्छे अनुभव नहीं हासिल करेंगे, तो फिर वे चिकित्सकीय व्यवहार-क्षेत्र मेें उतने सक्षम नहीं होंगे, जितना उनको होना चाहिए।
एमबीबीएस में दाखिला नीट परीक्षा के स्कोर के आधार पर भारी प्रतिस्पर्द्धा के बाद होता है। मगर उसके बाद पोस्ट ग्रेजुएशन (एमडी/एमएस आदि) के लिए सीटें पर्याप्त नहीं हैं। यहां एक प्रकार की ‘बॉटल-नेक’ स्थिति देखी जा रही है। इसके कारण, मेडिकल स्नातकों को उनका मनचाहा विशेषज्ञ-पाठ्यक्रम मिलना मुश्किल हो जाता है। सिस्टम पर भी इसका खासा असर पड़ता है। यदि पर्याप्त संख्या में विशेषज्ञ चिकित्सक नहीं होते हैं, तो टर्शियरी (तीसरे स्तर की) देखभाल, शिक्षण अस्पतालों की गुणवत्ता और शोध से जुड़ी गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं।
देश के चिकित्सा शिक्षण-संस्थानों में, सीटों के वितरण में और निजी बनाम सार्वजनिक संसाधनों में बहुत विविधता है। कुछ राज्यों में तो मेडिकल कॉलेज- क्लिनिकल लोड बहुत अच्छा है, जबकि कुछ में ऐसा नहीं है। निजी और सरकारी संस्थानों में भी संसाधनों, रोगी-संख्या, शिक्षक-दायित्व आदि में भारी अंतर देखने को मिलता है। यदि छात्रों को पर्याप्त ‘वास्तविक रोगी अनुभव’, ‘विभिन्न रोगों के क्लिनिकल केस’, ‘समर्थ अस्पतालों’ के भीतर व्यावहारिक प्रशिक्षण नहीं मिलता है, तो उनकी तैयारी कमजोर पड़ सकती है। यह जरूरी है कि सीटों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ संसाधन भी बढ़ाए जाएं। उनका संतुलित क्षेत्रवार वितरण तो होना ही चाहिए, साथ ही निजी-सरकारी मॉडल भी तैयार करना चाहिए।
भारत में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में सीटों का बढ़ना निस्संदेह सराहनीय है, लेकिन जैसा कि अक्सर कहा जाता है, ‘बहुत होना’ और ‘बहुत अच्छा होना’ दोनों जरूरी हैं। संख्या बढ़ गई, मगर गुणवत्ता, विशेषज्ञता, क्षेत्रीय संतुलन और क्लिनिकल-प्रशिक्षण की चुनौतियां अभी भी कायम हैं। लिहाजा, हमारे नीति-नियंताओं को यह सोचना ही चाहिए कि कैसे ‘अच्छा डॉक्टर तैयार करना’ सुनिश्चित किया जाए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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