
विवाह से क्यों कतराने लगीं कामकाजी युवतियां
पिछले दिनों तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला दिया। हैदराबाद में एक व्यक्ति ने अदालत में अर्जी लगाई कि उसकी पत्नी नौकरीपेशा है, मगर न तो खाना बनाती है, न ही घर के कामों में उसकी मां, यानी अपनी सास की मदद करती है….
क्षमा शर्मा,वरिष्ठ पत्रकार
पिछले दिनों तेलंगाना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला दिया। हैदराबाद में एक व्यक्ति ने अदालत में अर्जी लगाई कि उसकी पत्नी नौकरीपेशा है, मगर न तो खाना बनाती है, न ही घर के कामों में उसकी मां, यानी अपनी सास की मदद करती है। उसका यह व्यवहार क्रूरता की श्रेणी में आता है, इसलिए इसे तलाक का आधार माना जाए।
निचली अदालत ने उसकी अर्जी खारिज कर दी। वह व्यक्ति हाईकोर्ट पहुंचा। अदालत ने सारी दलीलें सुनने के बाद कहा कि आप एक बजे से रात 10 बजे तक काम करते हैं, जबकि आपकी पत्नी सवेरे नौ बजे से शाम छह बजे तक नौकरी करती है। इसलिए अगर वह सवेरे खाना नहीं बना पाती, तो इसे क्रूरता नहीं माना जा सकता। पति ने यह भी दलील दी कि पत्नी अक्सर अपने माता-पिता के घर रहने चली जाती है। उसके साथ नहीं रहती। इस पर भी अदालत ने याचिकाकर्ता को फटकारा कि उसके वक्तव्यों में विरोधाभास है। कभी उसने कहा कि पत्नी पांच महीनों तक उसके साथ रही, दूसरी बार कहा कि 21 महीनों की शादी में पत्नी बस दो-तीन महीने ही उसके साथ रही है। गर्भपात के बाद पत्नी का अपने माता-पिता के साथ रहना भी क्रूरता नहीं माना जा सकता। अदालत ने तलाक की उसकी मांग को खारिज कर दिया।
अपने देश में यह अक्सर देखने में आता है कि जो महिलाएं घर चलाती हैं और नौकरी भी करती हैं, उनका जीवन तरह-तरह की कठिनाइयों से भरा रहता है। सुबह-सवेरे उठकर बच्चों को स्कूल के लिए तैयार करना, उनका नाश्ता बनाना, दोपहर का खाना बनाना, फिर दफ्तर की तरफ दौड़ना और वहां की आफतों को झेलना और यह भी सुनना कि महिलाएं कुछ काम नहीं करतीं, उनके लिए काफी कष्टदायी होता है।
इन दिनों ऐसे वीडियो और रील की भरमार है, जिनमें सास, ससुर, ननद, अन्य नाते-रिश्तेदार स्त्रियों को यह ज्ञान बांटते दिखते हैं कि नौकरी करो या मत करो, घर के काम तो करने ही पड़ेंगे। घर में साथ रहने वाले सास, ससुर, अन्य नाते-रिश्तेदार सबकी देखभाल और उचित आतिथ्य की जिम्मेदारी बहू की ही है। वह थकान, अधिक काम या दफ्तर की किसी जरूरी मीटिंग में जाने की बात नहीं कह सकती। बहू या पत्नी के मतलब एक ऐसी कर्मचारी, जो किसी रोबोट की तरह चौबीस घंटे की नौकर है। घरेलू सहायिका को तो फिर भी हफ्ते में एक दिन छुट्टी देनी पड़ती है। उसकी खुशामद करनी पड़ती है, क्योंकि कहीं काम न छोड़ दे, लेकिन घर की स्त्री को यह अधिकार भी नहीं। विवाह का यह मतलब क्यों है कि कोई स्त्री बस रात-दिन काम करने, हर तरह की जिम्मेदारी उठाने और हर गलती अपने सिर लेने के लिए बनी है? बच्चे यदि कोई शरारत करें, उनसे कोई गलती हो जाए, तब भी सुनना पड़ता है कि कैसी मां है, बच्चों को कुछ नहीं सिखाया।
कर्तव्य का सारा बोझ यदि पत्नी के ही सिर है, तो उसके कुछ अधिकार भी तो होंगे। कर्तव्य और अधिकार एक-दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरा नहीं चल सकता। अक्सर खबरें आती हैं कि किसी देश की जीडीपी को बढ़ाने में स्त्रियों का कितना भारी योगदान है। जितने काम एक स्त्री अपने बल पर निपटाती है, यदि उन सबके लिए खर्च करना पड़े, तो अनुमान लगाया जा सकता है कि कितनी रकम खर्च होगी। यदा-कदा यह बात भी होती है कि घरेलू काम के लिए स्त्रियों को बाकायदा वेतन मिलना चाहिए, क्योंकि एक कामकाजी पुरुष को सप्ताह में एक दिन की साप्ताहिक छुट्टी मिलती है। इसके अलावर भी छुट्टियां मिलती हैं, पर एक महिला के हिस्से इनमें से कुछ नहीं आता। उसे बिना रुके, थके, सवेरे से गए रात तक काम करना पड़ता है।
यदि महिला नौकरी करने वाली है, तो उसकी आफतें दोहरी-तिहरी हैं। ऐसी महिला को हम बहुत सेलिब्रेट करते हैं। उसे त्याग की प्रतिमूर्ति बताते हैं। आखिर त्याग अपने बलिदान में ही क्यों छिपा है? कई मामलों में तो नौकरी करने वाली महिला का अपने वेतन पर भी कोई अधिकार नहीं होता। वर्षों पहले गाजियाबाद, फरीदाबाद से दिल्ली नौकरी करने आने वाली महिलाएं शाम को सब्जी खरीदकर ले जाती थीं। यात्रा के दौराने वे सब्जी काटते देखी जाती थीं। पुरानी पीढ़ी की महिलाओं को देखकर ही शायद इन दिनों बड़ी संख्या में स्त्रियां शादी नहीं करना चाहतीं। स्त्रियां बदल गई हैं, समाज नहीं बदला।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं।)

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