Hindi Newsओपिनियन नजरियाhindustan nazariya column 19 January 2026
हर बार औरतों के हाथ रहा ईरानी इंकलाब का परचम

हर बार औरतों के हाथ रहा ईरानी इंकलाब का परचम

संक्षेप:

ईरान में 1979 में जब इस्लामी क्रांति ने दस्तक दी और आयतुल्लाह खुमैनी पेरिस से तेहरान पहुंचे, तब उनके स्वागत में ईरानी औरतें आगे-आगे थीं। इन्हीं औरतों ने शाह पहलवी के खिलाफ जबर्दस्त प्रदर्शन किए थे…

Jan 18, 2026 11:19 pm ISTHindustan लाइव हिन्दुस्तान
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सुहेल वहीद,वरिष्ठ पत्रकार

ईरान में 1979 में जब इस्लामी क्रांति ने दस्तक दी और आयतुल्लाह खुमैनी पेरिस से तेहरान पहुंचे, तब उनके स्वागत में ईरानी औरतें आगे-आगे थीं। इन्हीं औरतों ने शाह पहलवी के खिलाफ जबर्दस्त प्रदर्शन किए थे। अब वही औरतें उसी मजहबी सत्ता के खिलाफ जंग लड़ रही हैं। ईरान के मौजूदा हालात के पसमंजर में हिजाब के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन का बड़ा हाथ है, जो सितंबर 2022 में महसा अमीनी के कत्ल के बाद से ईरान ही नहीं, विदेशों में भी फैल गया था।

ईरान में लगातार उस आंदोलन का दमन किया जाता रहा, पर वह रह-रहकर उभर आता है। नवंबर 2024 में तेहरान यूनिवर्सिटी में एक छात्रा हिजाब के खिलाफ इतनी गुस्से में आ गई कि वह अपने पूरे कपड़े उतारकर कैंपस में घूमने लगी थी। हिजाब, महिला अधिकार और मानव अधिकारों के हनन के खिलाफ जद्दोजहद के लिए पूर्व अभिनेत्री और इंजीनियर नरगिस मोहम्मदी करीब 13 साल जेल में गुजार चुकी हैं, उन्हें साल 2023 में शांति के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था।

ईरान में जब कभी कोई आंदोलन हुआ या क्रांति आई, उसमें ईरानी औरतों ने जबर्दस्त रोल अदा किया है। 1979 के ‘इस्लामी इंकलाब’ के लिए भी ईरानी औरतों ने गोलियां खाई थीं। इस ऐतिहासिक घटना के करीब आठ साल पहले विख्यात लेखिका पद्म विभूषण कुर्रतुल ऐन हैदर ईरान गई थीं और वापस आने के बाद उन्होंने एक शानदार रिपोर्ताज कोहे दमावंद लिखा। उसमें उन्होंने उस वक्त के शाही ईरान का बड़ा उम्दा मंजरनामा पेश किया है। ज्ञानपीठ से सम्मानित कुर्रतुल ऐन हैदर तब ईरान के शाह की मेहमान थीं।

एक कार्यक्रम के बारे वह में लिखती हैं, ‘तीसरे रोज अमजदिया स्टेडियम में तकरीबन पचास हजार नौजवान लड़के-लड़कियों ने वर्जिशी मुकाबले पेश किए। लड़कियां लड़कों के साथ कराटे लड़ीं, मोटर बाइक सवार जनाना पुलिस की लड़कियों ने हैरतअंगेज करतब दिखाए। आग के चक्करों से अपनी मोटरसाइकिलें कुदा ले गईं। ईरानी महिलाओं की यह तरक्की वाकई काबिले तारीफ थी, इसकी शुरुआत रजा शाह कबीर ने की थी। प्रोग्राम में पूरे ईरान की महिला कॉलेजों और स्कूलों की लड़कियां हिस्सा ले रही थीं। तब रानी शहबानो के सानो गुमान में न था कि यही छात्र और बुद्धिजीवी शहंशाहियत के खिलाफ संघर्ष का आगाज करेंगे। उनकी तस्वीरें जलाएंगे, ‘मर्ग बरशाह’ के नारे लगाएंगे और खुशी-खुशी मशीनगनों का निशाना बनेंगे। ये मोटर बाइक सवार और जूडो-कराटे करने वाली लड़कियां कौमी जद्दोजहद के सिंबल के तौर पर सियाह चादरें ओढ़कर उस इंकलाब में शामिल होंगी। उनको और मुझ समेत अनेक लोगों को उस वक्त मालूम न था कि ये नई मिडिल क्लास लड़कियां आठ साल बाद शहंशाहियत के खिलाफ मोर्चा लगाकर तेहरान के इस मैदान में गोलियों का निशाना बन जाएंगी, जिसे अब ईरानी ‘शिकारगाहे शहंशाही’ कहते हैं।’

दिलचस्प यह है कि खुमैनी को जब 1964 में देश निकाला दिया गया, तब ईरानी औरतों ने सड़कों पर जबर्दस्त प्रदर्शन किए थे और 1978 आते-आते हर तबके की ईरानी औरतें शाह के खिलाफ मोर्चा खोल चुकी थीं। इन प्रदर्शनों में 1963 की पश्चिमी सभ्यता को थोपने वाले ‘काफूरी इंकलाब’ व शाह की खुफिया पुलिस के रवैये का भी बड़ा हाथ था।

इस समय ईरान का सबसे बड़ा हिमायती रूस है। उसी के खिलाफ 1911 में ईरानी औरतों ने संसद के सामने जबर्दस्त प्रदर्शन किए थे, बहारिस्तान स्क्वॉयर में जोरदार तकरीरें कीं और नज्में पढ़ी थीं। रजा शाह कबीर ने 1937 में गर्ल्स कॉलेज खोला और ईरानी औरतों की दुनिया बदल दी। 1962 में ईरानी औरतों को वोट का अधिकार भी शाह ने ही दिया था। लेकिन, अब वहां की इविन जेल औरतों के लिए काल-कोठरी बन गई है। कितनी महिलाएं जेल में हैं, कोई नहीं जानता। पिछले साल मार्च में एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा था ईरान में औरतों व लड़कियों के खिलाफ व्यवस्थागत भेदभाव, हिंसा तथा महिला अधिकारों का खुला हनन हो रहा है। पिछले वर्ष जब ईरान ने इजरायल पर जवाबी हमले किए, तब वार कंट्रोल रूम की मॉनिटरिंग करते हुए ईरानी लड़कियों के वीडियो भी आए थे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)