हिलसा अगर लुप्त हुई, तो एक संस्कृति भी मिट जाएगी
बंगाल और मछली का संबंध कितना मजबूत है, इसका अंदाजा वहां चल रहे चुनाव प्रचार में भी देखने को मिला। राज्य की बिधाननगर सीट से भाजपा उम्मीदवार शारद्वत मुखर्जी चैत्र नवरात्र के दौरान मछली हाथ में लटकाकर वोट मांगते हुए कैमरे में कैद हो गए…

पंकज चतुर्वेदी,वरिष्ठ पत्रकार
बंगाल और मछली का संबंध कितना मजबूत है, इसका अंदाजा वहां चल रहे चुनाव प्रचार में भी देखने को मिला। राज्य की बिधाननगर सीट से भाजपा उम्मीदवार शारद्वत मुखर्जी चैत्र नवरात्र के दौरान मछली हाथ में लटकाकर वोट मांगते हुए कैमरे में कैद हो गए। तब अनेक विपक्षी दलों ने भाजपा पर तंज-ताने कसे और इसके नेताओं को उनके पुराने बयानों के लिए कठघरे में खड़ा किया।
बहरहाल, यहां मुद्दा राजनीति नहीं, हिलसा मछली के वजूद पर संकट है। पश्चिम बंगाल और उससे सटे उत्तर बंगाल की खाड़ी के तटीय इलाकों में हिलसा सिर्फ एक मछली नहीं, संस्कृति, स्वाद और आजीविका का अभिन्न हिस्सा है। नदियों में बढ़ते कचरे, जगह-जगह अविरल धारा को बांधों द्वारा रोकने और मछली पकड़ने की परंपराओं को बिसराने से आज यह शानदार मछली और इस पर निर्भर कई लाख मछुआरे गहरे संकट में हैं। छोटी हिलसा को स्थानीय भाषा में जाटका या खोका कहा जाता है, जिनका वजन 200 से 500 ग्राम के बीच होता है। इनका धड़ल्ले से शिकार इस मछली के अस्तित्व को मिटा रहा है।
हिलसा को भारत और बांग्लादेश, दोनों देशों में आर्थिक, पारंपरिक व सांस्कृतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। भारत में खासकर बंगाल, ओडिशा, बिहार और असम के नदी तटीय इलाकों में यह लोगों की थाली का अहम हिस्सा रही है। यह एक ‘एनाड्रोमस’ मछली है, यानी यह समुद्र में रहती है, पर अंडे देने के लिए नदियों, खासकर गंगा-हुगली के मीठे पानी में आती है। इसके बच्चे बड़े होकर वापस समुद्र में लौट जाते हैं। शुरू के करीब पांच महीने तक ये छोटी मछलियां हावड़ा से मुर्शिदाबाद जिले के फरक्का बैराज तक धारा की विपरीत दिशा में तैरती हुई लगभग 523 किलोमीटर क्षेत्र में रहती हैं। जब मछुआरे हिलसा के इन छोटे बच्चों को जाल में फंसा लेते हैं, तब वे एक पूरी पीढ़ी को नष्ट कर देते हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि लगातार छोटे आकार की मछलियों को पकड़े जाने से पूर्ण विकसित हिलसा का मिलना लगभग बंद हो गया है। इससे प्रजनन करने वाली वयस्क मछलियों की संख्या में भारी कमी आई है।
सरकार ने जाटका के शिकार पर प्रतिबंध लगा रखा है, लेकिन नियमों का पालन कराने में तंत्र विफल रहा है। इसके पीछे कई कारण हैं। एक, कोलकाता जैसे महानगर व बड़े शहरों में और त्योहारों के दौरान छोटी हिलसा की मांग बहुत ज्यादा होती है, जिससे यह काफी ऊंचे दाम पर बिकती है। दूसरा, अत्यधिक गरीबी और वैकल्पिक आजीविका का अभाव मछुआरों को मजबूरी में प्रतिबंधित आकार की मछली पकड़ने को मजबूर करता है। तीसरा, अवैध जालों के उपयोग को रोकने के लिए तटीय और मुहाना क्षेत्रों में निगरानी नाकाफी है।
इसी बंगाल की खाड़ी में पड़ोसी देश बांग्लादेश ने अपनी हिलसा नीति से एक मिसाल पेश की है। उसने जाटका संरक्षण सप्ताह मनाया, एक खास अवधि तक मछली पकड़ने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया और अवैध जालों को नष्ट करवाया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि वहां के प्रशासन ने प्रभावित मछुआरों के लिए नगद सहायता और राशन वितरण जैसी योजनाएं लागू कीं, ताकि इस दौरान उन्हें परिवार का पेट पालने की चिंता न सताए। परिणामस्वरूप, बांग्लादेश में हिलसा का उत्पादन बढ़ गया है। उधर बांग्लादेश से हमारे संबंधों में कड़वाहट का असर भी हिलसा पर पड़ा। सरहद पार से मछली का आना बंद हुआ, तो कोलकाता के बाजार में इसके दाम 2,200 से 2,400 रुपये किलो हो गए। कहा जा रहा है कि बंगाल में हिलसा के व्यापार पर एक संगठित माफिया गिरोह की पकड़ है।
गंगा के प्रदूषण ने भी हिलसा के प्रवासन और प्रजनन को खतरे में डाला है। गाद जमा होने और कम जलप्रवाह से उनके प्रजनन स्थल नष्ट हो रहे हैं। साल 2010 तक नदियों की सैर करते-करते ये मछलियां प्रयागराज, कानपुर और आगरा तक आ जाती थीं। सन् 1975 में गंगा नदी में फरक्का बैराज बनने के बाद समुद्र से नदियों की ओर आ पाना हिलसा के लिए मुश्किल हो गया।
जाहिर है, यदि हमने अब भी अपनी नीतियों को नहीं सुधारा, तो आने वाली पीढ़ियां केवल तस्वीरों में ही ‘मछलियों की इस रानी’ को देख पाएंगी।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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