चार धाम यात्रा में आस्था और पर्यावरण का तालमेल जरूरी
चार धाम यात्रा की रविवार 19 अप्रैल से शुरुआत हो रही है। अक्षय तृतीया के पावन मौके पर यमुनोत्री व गंगोत्री के कपाट खुल जाएंगे और 22 अप्रैल से केदारनाथ व 23 अप्रैल से बद्रीनाथ धाम श्रद्धालु जा सकेंगे…

अनूप नौटियाल, सामाजिक कार्यकर्ता
चार धाम यात्रा की रविवार 19 अप्रैल से शुरुआत हो रही है। अक्षय तृतीया के पावन मौके पर यमुनोत्री व गंगोत्री के कपाट खुल जाएंगे और 22 अप्रैल से केदारनाथ व 23 अप्रैल से बद्रीनाथ धाम श्रद्धालु जा सकेंगे। चूंकि सनातन धर्म में इस यात्रा का काफी महत्व है, इसलिए अच्छी-खासी संख्या में श्रद्धालु यहां आते रहते हैं।
वर्ष 2024 में 48 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने चार धाम यात्रा की, जबकि 2025 में यह संख्या 6.4 प्रतिशत बढ़कर 51 लाख से अधिक हो गई। हालांकि, 2023 में दर्ज 56,16,653 श्रद्धालुओं की तुलना में 2025 का आंकड़ा कम था, पर यह संकेत है कि संख्या में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक है और इसे सफलता या विफलता का एकमात्र पैमाना नहीं बनाना चाहिए। इसके बजाय, हमें यह समझना चाहिए कि यहां कितनी संख्या सुरक्षा, सुगमता व पर्यावरणीय दृष्टि से संभाली जा सकती है। पाथवेज टु पिलग्रिमेज : डाटा इनसाइट्स, चैलेंजेज ऐंड ऑपर्च्युनिटीज रिपोर्ट साल 2025 की यात्रा की पृष्ठभूमि में ही मैंने तैयार की है। यह रिपोर्ट गंगोत्री, यमुनोत्री, केदारनाथ, बद्रीनाथ और हेमकुंड साहिब धामों में श्रद्धालुओं के रुझानों का समग्र चित्र पेश करती है, जिसमें हितधारकों के दृष्टिकोण और सुरक्षा व प्रबंधन से जुड़े विशेषज्ञों के सुझाव शामिल किए गए हैं।
इस अध्ययन में हमने वर्ष 2025 में उत्तराखंड में जलवायु परिवर्तन और आपदा के जो पांच प्रमुख रुझान देखे, वे एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। पहला, बुनियादी ढांचा-जनित आपदा जोखिम, जहां सड़कें, सुरंगें और अन्य निर्माण-गतिविधियां भूस्खलन और भू-धंसाव के खतरे बढ़ाती हैं। दूसरा, ग्लेशियर झीलों में तेजी से हो रहे बदलाव, जो याद दिलाते हैं कि हमारी तैयारी अब भी इस बदलते जोखिम के मुकाबले अपर्याप्त है। तीसरा, शहरी और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में आपदाओं का उभरना, जो दर्शाता है कि अब जोखिम केवल दूरदराज के पहाड़ी इलाकों तक सीमित नहीं रहा। चौथा, प्रशासनिक देरी और जवाबदेही की कमी, जो आपदा के दुष्प्रभावों को गति देती हैं और पांचवां, पर्यटकों का बढ़ता दबाव, जो आर्थिक मौके तो देते हैं, पर पारिस्थितिकीय संतुलन पर भारी बोझ भी डालते हैं।
वर्ष 2025 के इस विश्लेषण में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है। उस साल पांचों धामों में कई दिनों तक शून्य या अत्यंत कम श्रद्धालु-संख्या दर्ज की गई, जो आपदा, भूस्खलन व बुनियादी ढांचे की कमजोरियों का परिणाम है। 2025 में कुल 86 शून्य-श्रद्धालु दिवस दर्ज किए गए, जबकि 67 दिनों में मात्र एक से 500 और 80 दिनों में 501 से 1,000 श्रद्धालु आए। यमुनोत्री में सबसे अधिक 38 शून्य-श्रद्धालु दिवस रहे, जबकि गंगोत्री में 35। केदारनाथ, बद्रीनाथ और हेमकुंड साहिब में भी कई दिन कम या शून्य ‘फुटफॉल’ वाले रहे, जो पूरे सीजन में तीर्थयात्रियों के आगमन में बड़े उतार-चढ़ाव और व्यवधान को दर्शाते हैं।
चार धाम यात्रा के सुरक्षित और सतत प्रबंधन के लिहाज से 10 कदम उठाए जाने बहुत जरूरी हैं। इनमें श्रद्धालुओं की संख्या से अधिक सुरक्षा को प्राथमिकता देना, ‘कैरिंग कैपेसिटी’ आधारित नियम लागू करना और एक व्यापक आपदा प्रबंधन प्रणाली स्थापित करना शामिल है। हेलीकॉप्टर संचालन के लिए हवाई सुरक्षा मानकों को मजबूत करने, जलवायु अनुकूलन, सतत बुनियादी ढांचे के विकास को बढ़ावा देने, चिकित्सा व स्वास्थ्य सुरक्षा प्रणाली को बेहतर बनाने पर जोर दिया जाना चाहिए। पिछले वर्ष यहां छह सप्ताह में पांच हेलीकॉप्टर दुर्घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें दो घातक थीं और वे 13 लोगों को मौत की नींद सुला गईं। अन्य सुझावों में स्थानीय समुदायों सहित हितधारकों की भागीदारी बढ़ाना, अपशिष्ट प्रबंधन, स्वच्छ परिवहन व पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना, डाटा-आधारित व तकनीक-सक्षम यात्रा प्रबंधन प्रणाली विकसित करना शामिल है।
निस्संदेह, विकास व आस्था, दोनों महत्वपूर्ण हैं, पर यदि इनको प्रकृति की सीमाओं व जोखिमों को नजरअंदाज करके आगे बढ़ाया गया, तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। इसलिए, आज जरूरत एक ऐसे रास्ते की है, जहां प्रगति व संरक्षण साथ-साथ चलें और हर निर्णय में हिमालय की नाजुकता को केंद्र में रखा जाए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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