सरकारी और निजी नौकरी का अंतर मिटाना चाहिए
पूरे उत्तर प्रदेश में 6 जून से 10 जून के मध्य रेलवे और बस स्टेशनों पर लोगों को थके उदास चेहरों वाली एक अनियंत्रित भीड़ दिखाई दी। इसमें वे नौजवान शरीक थे, जो किसी न किसी तरह एक सरकारी नौकरी हासिल करना चाहते हैं…

विभूति नारायण राय,पूर्व कुलपति एवं साहित्यकार
पूरे उत्तर प्रदेश में 6 जून से 10 जून के मध्य रेलवे और बस स्टेशनों पर लोगों को थके उदास चेहरों वाली एक अनियंत्रित भीड़ दिखाई दी। इसमें वे नौजवान शरीक थे, जो किसी न किसी तरह एक सरकारी नौकरी हासिल करना चाहते हैं, भले ही यह नौकरशाही के पदक्रम में सबसे निचले पायदान पर स्थित क्यों न हो। इसके लिए वे कुछ भी करने को तैयार थे। उन्होंने महीनों, कुछ मामलों में तो वर्षों, इसके लिए शारीरिक और बौद्धिक तैयारी की थी। जिन्हें उम्मीद नहीं थी कि ईमानदारी से कुछ हो सकता है, वे खेत-बारी बेचकर दलालों की तलाश कर रहे थे। ये सब उन शहरों की तरफ भागे चले जा रहे थे, जहां उत्तर प्रदेश पुलिस के 32 हजार से अधिक कांस्टेबलों की भर्ती के लिए लिखित परीक्षा होने वाली थी। 28 लाख से कुछ अधिक अभ्यर्थियों ने आवेदन किए थे और उनमें से लगभग 22 लाख लिखित परीक्षा में बैठे।
पिछले कुछ वर्षों में नौकरी का मतलब सरकारी नौकरी हो गया है। अपने गांव के एक पुस्तकालय में बैठकर मैंने बहुत से ऐसे नौजवानों से बात करके समझने की कोशिश की है कि आखिर वह कौन सा चुंबक है, जो इन्हें छोटी सी सरकारी नौकरी के लिए इस कदर आकर्षित करता है कि वे येन-केन-प्रकारेण इसे हासिल करने में जुट जाते हैं? वहां मुझे एक नौजवान मिलता है, जिसने पश्चिमी यूपी के एक कॉलेज से बीएससी (बायो-टेक्नोलॉजी) कर रखा है। उसकी भारी-भरकम डिग्री से प्रभावित होकर मैं जानने की कोशिश करता हूं कि वह अपने अध्ययन क्षेत्र की संभावनाओं को छोड़कर कांस्टेबल की नौकरी हासिल करने की कोशिश क्यों कर रहा है? समझना बहुत मुश्किल नहीं है। वह देहरादून की एक फर्म में नौकरी कर रहा था, जहां उसे 18,000 रुपये महीने पगार मिलती थी। प्रतिदिन दस घंटे से अधिक काम वाली इस नौकरी में कोई स्थायित्व या सुरक्षा नहीं थी।
हमारी बातचीत से आकर्षित होकर दूसरे लड़के-लड़कियां भी अपनी पढ़ाई छोड़कर हमारे इर्द-गिर्द सिमट आते हैं। वे सब किसी न किसी तरह से एक अदद सरकारी नौकरी हासिल करने के लिए पुस्तकालय में हाड़तोड़ मेहनत कर रहे हैं। सबके चेहरे निस्तेज हैं और किसी की आंखों में यह विश्वास नहीं झलक रहा कि उनकी मेहनत सफल हो सकेगी। कारण स्पष्ट है, सरकारी नौकरियां बहुत कम हैं। सालों बाद जब कोई परीक्षा होती भी है, तो कुछ सौ जगहों के लिए कई लाख अभ्यर्थी टूट पड़ते हैं और अगर पेपर आउट होने या अदालती हस्तक्षेप जैसी आशंकाओं से बच भी जाएं, तो इस प्रक्रिया में जिन युवाओं को नौकरी मिलती है, उनकी संख्या ऊंट के मुंह में जीरा जैसी होती है।
सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों के बीच वेतन का अंतर पिछले वर्षों में भयानक रूप से बढ़ा है। खास तौर से पांचवें और छठे वेतन आयोगों के बाद यह खाई और चौड़ी हो गई है। इस फर्क को समझने के लिए एक उदाहरण पर्याप्त होगा। मुझे याद है, जब 2008 में मैं हिंदी विश्वविद्यालय का कुलपति हुआ, तब तक सरकारी संस्थानों में तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के ज्यादातर पद ठेके पर दे दिए गए थे। विश्वविद्यालय में आधे ड्राइवर स्थायी सरकारी नौकर थे, जिन्हें 40 हजार रुपये के लगभग वेतन मिलता था और साथ में छुट्टियां, आवास, चिकित्सा व बच्चों के लिए शिक्षा भत्ते जैसी सुविधाएं अलग थीं। इनके बरक्स ठेके पर आने वाले ड्राइवर बिना किसी अतिरिक्त सुविधा के 15-20,000 पर वही काम कर रहे थे। यह असमानता दिनोंदिन बढ़ती ही चली गई।
यह एक सामान्य समझ है कि दुनिया में कोई भी सरकार अकेले सबको नौकरी नहीं दे सकती। सरकारें रोजगार सृजन के लिए सहायक स्थितियां निर्मित कर सकती हैं। एक साक्षात्कार में राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषक अजित कुमार झा ने जोर देकर कहा है कि उत्तर प्रदेश में जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है (साल 2023-24 में राष्ट्रीय वृद्धि दर से अधिक 2.2 प्रतिशत आंकी गई) और इसकी औसत उम्र 24.7 वर्ष हो गई है। इस बढ़ती युवा शक्ति के लिए एक बड़ी औद्योगिक क्रांति की जरूरत होगी, जिसमें सेवा क्षेत्र के मुकाबले विनिर्माण क्षेत्र पर विशेष ध्यान देना होगा। शिक्षा के क्षेत्र में भी ऐसे सुधारों की जरूरत है, जिनसे बेरोजगारों की फौज के स्थान पर रोजगार योग्य नौजवान तैयार हो सकें।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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