बदलते हुए समाज की पाठ्य-पुस्तकें भी बदलनी चाहिए
किसी भी देश या समाज के स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली पाठ्य-पुस्तकें वस्तुतः उसके समाज का आईना होती हैं। जब विकास, आधुनिकता और नए परिवर्तनों के कारण समाज बदलते हैं, तब नई किताबों की जरूरत होती है…

बद्री नारायण, कुलपति, टीआईएसएस, मुंबई
किसी भी देश या समाज के स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली पाठ्य-पुस्तकें वस्तुतः उसके समाज का आईना होती हैं। जब विकास, आधुनिकता और नए परिवर्तनों के कारण समाज बदलते हैं, तब नई किताबों की जरूरत होती है। पाठ्य-पुस्तकें ऐसी होनी चाहिए, जो सामाजिक सच्चाइयों, उनकी गतिशीलता को उनके अंतर्विरोधों व जटिलताओं के संदर्भ में समझाएं। इसके साथ ही बाल व किशोर मन के लिए सरल, सहज, आकर्षक व आहत न होने वाले ज्ञान को इनमें जगह दी जानी चाहिए।
पाठय-पुस्तकों को लेकर द्वंद्व न केवल भारत में, बल्कि यूनान, जापान, ऑस्ट्रिया, अमेरिका, रोम, स्पेन जैसे कई मुल्कों में उठते रहे हैं। इनमें से ज्यादातर विवाद राष्ट्रीय अस्मिताओं के विश्लेषण, राष्ट्रीय इतिहास व समाज-विमर्श में समुदायों के चित्रण के तरीके, उनको जगह जैसे मुद्दों से जुड़े रहे हैं। कई राष्ट्रों ने विभिन्न समूहों के विशेषज्ञों के साथ संवाद करके ऐसे मुद्दों को सुलझाया है। हमें भी ऐसे विवादों का बौद्धिक समाधान ढूंढ़ना होगा। यहां विषय-विशेषज्ञ ‘कंटेंट कमीशन’ जैसा ढांचा बनाकर ऐसे विवादों को सुलझा सकते हैं। भारत में नव-उदारवादी व्यवस्था आने के बाद विकास की गति तेज हुई है। समाज की आलोचना के हमारे ढंग में परिवर्तन आया है। भारत के उत्तर-पूर्व व अनेक सीमा-क्षेत्रों के बारे में हमारी जानकारियां और ज्ञान बढ़े हैं। टेलीविजन, सोशल मीडिया और समाचारपत्रों के तेज प्रसार के कारण हमें अपने समाज के अनेक अच्छे-बुरे रंग दिखने लगे हैं। ऐसे में, जो सामाजिक ज्ञान स्कूलों में पढ़ाया जाता था, उसमें अब परिवर्तन की जरूरत है।
भारत में नई शिक्षा नीति-2020 और नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क-2023 के तहत पाठ्यक्रम बनाने का काम शुरू हुआ। इसके लिए कुछ ज्ञानपरक कसौटियां बनाई गईं। पहली यह कि विषयों व पाठों की अंतर्रचना ऐसी हो, जिसमें बदलते समाज का प्रकटीकरण हो। दूसरी, अतीत, वर्तमान व भविष्य का सतत संवाद इसमें दिखे। तीसरी, बच्चों को मात्र किताबी ज्ञान तक सीमित न कर, उन्हें जीवन के ज्ञान से जोड़ा जाए। चौथी, बच्चों में सरल, सहज और रोचक ढंग से प्रश्नकुलता विकसित की जाए। पांचवीं, समता, न्याय, भाईचारा, समरसता व सांविधानिक मूल्यों को रोचक अभ्यासों के माध्यम से पढ़ाया जाए। इस फ्रेमवर्क में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा बनाई गई विशेषज्ञों की टोलियों ने पाठ्य-पुस्तक बनाने की परियोजना विकसित की है। इस काम में लगी संस्थाओं के सामने अनेक बड़ी चुनौतियां हैं। पहली चुनौती, देश के शिक्षक, शिक्षित एवं जागरूक वर्ग को यह समझाना है कि बदलते समाज में सामाजिक ज्ञान को देखने, समझने व पढ़ने की रूढ़िगत सोच बदली जाए। दूसरी, सामाजिक सच्चाइयों के पूर्व निर्मित रूढ़िगत वृत्तांतों को छोड़ने के लिए खुद को और दूसरों को तैयार करना। तीसरी, नए सामाजिक ज्ञान के स्वीकार का भाव हमारे शिक्षक और शिक्षित समुदाय में विकसित करना।
किसी भी पाठ्य-पुस्तक की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसे पढ़ने वाला उसमें वर्णित ज्ञान से कितना सहमत है। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए एनसीईआरटी पूरे देश में शिक्षक संवाद आयोजित कर सकती है। स्कूली ज्ञान-विमर्श से देश के बड़े समाजशास्त्रियों व समाज विज्ञानियों को जोड़ना होगा। इस संदर्भ में एक बड़ी समस्या यह है कि जब सामाजिक सच्चाइयां इतनी विविध, जटिल और तीव्र गति से परिवर्तनशील हैं, तो उनमें से क्या चुना जाए, क्या नहीं? इस प्रश्न का उत्तर बहुत कठिन है, पर यह कहा जा सकता है कि जो सामाजिक सच्चाई समाहारी हो, कोमल मन को सहज ग्राह्य हो, वह प्राथमिकता होनी चाहिए।
अभी हाल ही में एनसीईआरटी के सामाजिक विज्ञान की पाठ्य-पुस्तक में भ्रष्टाचार पर उभरे विवाद पर भारत के प्रधानमंत्री ने कहा था, कोमल किशोर मानस वाले स्कूली छात्रों को भ्रष्टाचार पर पाठ अभी क्यों पढ़ाया जाए? अभी सिर्फ ज्ञान के सत्य, शिव और सुंदर वाले पक्ष को जगह मिले, तो श्रेयष्कर होगा। ऊंची कक्षाओं में छात्र को सामाजिक ज्ञान के अन्य पक्षों से जोड़ना चाहिए।
यह तय है कि विकासशील समाज का समाज विज्ञान भी गतिशील होगा। ऐसे में, हमें अपनी पाठ्य-पुस्तकों को बार-बार लिखना होगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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