
अब समूची मानवता की साझा सांस्कृतिक पूंजी दीपावली
दीपों की रात अब केवल हमारे आंगन की सीमित उजास नहीं रही; वह विश्व-संस्कृति की साझा स्मृति बनकर फैल गई है। अयोध्या में दीपावली के पंक्तिबद्ध दीये भगवान राम के स्वागत में मंगल वातावरण रचते रहे हैं….
परिचय दास ,प्रोफेसर, नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय, नालंदा
दीपों की रात अब केवल हमारे आंगन की सीमित उजास नहीं रही; वह विश्व-संस्कृति की साझा स्मृति बनकर फैल गई है। अयोध्या में दीपावली के पंक्तिबद्ध दीये भगवान राम के स्वागत में मंगल वातावरण रचते रहे हैं। दीपावली, जिसके दीये पीढ़ियों से हमारे घरों में जलते रहे, अब यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल होकर वैश्विक परंपराओं की विशाल पंक्ति में अपना स्थान पा चुकी है।
दीपावली की परंपरा केवल प्रकाश की नहीं है; यह अपने भीतर स्मृतियों का एक बहता हुआ कुंभ है। घर-आंगन की सफाई, रंगोली की मौन भाषा, घी के दीयों की लौ, सामुदायिक मेल-जोल, त्योहार की खरीदारी, छोटे-छोटे व्यावसायिक केंद्रों का जीवंत हो उठना- इन सबका सम्मिलित नाद दीपावली कहलाता है। यही वे तत्व हैं, जो इसे विश्व-धरोहर के रूप में विशिष्ट बनाते हैं, क्योंकि यह उत्सव न सिर्फ सौंदर्य का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता, परंपरा के हस्तांतरण और रचनात्मक लोक-शिल्प का जीवित दस्तावेज भी है। यूनेस्को द्वारा इसके चयन का अर्थ है कि अब यह उत्सव समूची मानवता की साझा सांस्कृतिक पूंजी है। दीपावली का समावेश हमारे सांस्कृतिक वैभव को और अधिक समृद्ध करेगा।
इसके पहले यूनेस्को ने भारत की सबसे पुरानी सांस्कृतिक धरोहरों में से एक, उत्तर भारत में रामायण पर आधारित नाट्य‑प्रदर्शन रामलीला को 2008 में अमूर्त सांस्कृतिक विरासत करार दिया था। उसी साल उसने वैदिक मंत्रों के मौखिक जप को भी इस सूची में शामिल किया। साल 2010 में यूनेस्को ने ओडिशा, पश्चिम बंगाल व झारखंड में प्रचलित युद्ध‑आकर्षक लोकनृत्य‑परंपरा छऊ और राजस्थान के कालबेलिया समुदाय द्वारा प्रस्तुत नाग‑नृत्य‑आधारित लोक-परंपरा कालबेलिया नृत्य को सांस्कृतिक विरासत की मान्यता दी; बाद के वर्षों में केरल की लोक धार्मिक नाट्य‑परंपरा मुडियेट्टु; योग, कुंभ‑मेला, दुर्गा पूजा, भोजपुरी गीत परंपरा को अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर के रूप में शामिल किया गया। कनार्टक व केरल में नृत्य-पूजा का अनुष्ठान थेय्यम और गुजरात का गरबा अभी यूनेस्को की आधिकारिक सूची में शामिल नहीं हैं; मगर ये प्रस्तावित परंपराएं हैं।
भारत यूनेस्को द्वारा घोषित 42 विश्व विरासत स्थलों का एक गौरवशाली देश है। अजंता-एलोरा की गुफाओं से लेकर कुतुब मीनार, हम्पी, खजुराहो, जयपुर, ताजमहल और सुंदरवन जैसे प्राकृतिक क्षेत्रों तक यह सूची भारतीय सौंदर्य, वास्तुकला और विविध पर्यावरण का जीवंत सूचकांक बनकर खड़ी है। इन धरोहरों में साल 2016 में जुड़ा श्री नालंदा महाविहार प्राचीन भारत का सबसे बड़ा, व्यवस्थित और अंतरराष्ट्रीय स्वरूप वाला विश्वविद्यालय था। नालंदा केवल ईंट-पत्थरों का अवशेष नहीं, यह वह प्रकाश-स्तंभ था, जहां से ज्ञान की रोशनी बटोरने विश्व के कोने-कोने से विद्यार्थी आते थे।
यूनेस्को की मान्यता का एक व्यावहारिक पक्ष भी है। शोध बताते हैं, वैश्विक विरासत की सूची में किसी स्थल या परंपरा के शामिल किए जाने से पर्यटन, वैश्विक रुचि व संस्कृति-आधारित आय में उल्लेखनीय वृद्धि होती है। भारत में 2023 में लगभग एक करोड़, 90 लाख विदेशी पर्यटक आए व पर्यटन क्षेत्र ने देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान किया। यूनेस्को की मान्यता अपने साथ दायित्व भी लाती है। सुरक्षा, संरक्षण, सुदृढ़ प्रबंधन और सांस्कृतिक परंपराओं के प्रामाणिक प्रस्तुतिकरण का दायित्व। दीपावली को अब जब वैश्विक विरासत का दर्जा मिल गया है, तब हमारी जिम्मेदारी बढ़ गई है कि हम इस त्योहार की सांस्कृतिक आत्मा को सुरक्षित रख सकें, कारोबारी चमक-दमक के बीच उसकी गरिमा खोने न दें।
दीपावली का वैश्विक होना तभी सार्थक होगा, जब इसके कारण मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों, रंगोली रंगने वाली स्त्रियों, लोक गीत गाने वाले समुदायों, हस्तशिल्पकारों और छोटे बाजारों को नए अवसर मिलेंगे और उन्हें नया सम्मान मिलेगा। यह चयन एक निमंत्रण है- अपने भीतर के दीप को पहचानने और विश्व के सामने अपनी सांस्कृतिक भूमि की उजास को नए आयामों में प्रस्तुत करने का। यह क्षण हमें स्मरण कराता है कि संस्कृति सिर्फ ‘दिखाने’ की चीज नहीं, जीने की प्रक्रिया है, जिसे सुरक्षित रखना हम सबका सामूहिक कर्तव्य है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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