दो द्रविड़ दलों के चुनावी रथ को डगमग कर रहे विजय
तमिलनाडु विधानसभा का 23 अप्रैल को होने वाला मतदान रोमांचक चरण में प्रवेश कर रहा है। द्रमुक और अन्नाद्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधनों के बीच टीवीके रूपी एक तीसरा पहलवान आ गया है, जो दोनों द्रविड़ पहलवानों के चुनावी रथ…

एस श्रीनिवासन, वरिष्ठ पत्रकार
तमिलनाडु विधानसभा का 23 अप्रैल को होने वाला मतदान रोमांचक चरण में प्रवेश कर रहा है। द्रमुक और अन्नाद्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधनों के बीच टीवीके रूपी एक तीसरा पहलवान आ गया है, जो दोनों द्रविड़ पहलवानों के चुनावी रथ को डगमग कर रहा है। वर्तमान स्थिति को समझने के लिए अतीत में देखना होगा।
साल 1967 और 1977 में तमिलनाडु की चुनावी राजनीति उलट-पुलट हो गई और 2006 में भी ऐसी ही स्थिति पैदा हुई, जब पारंपरिक दो-ध्रुवीय लड़ाई तीसरे प्रतिद्वंद्वी के प्रवेश से खतरे में पड़ गई थी। आजादी के बाद से राज्य पर शासन करने वाली कांग्रेस सरकार 1967 में द्रमुक से हार गई और तब से कभी भी सत्ता में नहीं लौटी। उस समय द्रविड़ विचारधारा को राज्य की राजनीति का आधार बनाने वाले करिश्माई नेता सीएन अन्नादुरई ने मुख्यमंत्री के रूप में पदभार संभाला। 1969 में उनकी मृत्यु के बाद कवि और पटकथा लेखक के करुणानिधि ने उनकी जगह ली, लेकिन वह 1976 तक ही टिक सके। उनके लंबे समय के सहयोगी अभिनेता एमजी रामचंद्रन ने उन्हें पटखनी दे दी। एमजीआर 1987 में अपनी मृत्यु तक सत्ता पर काबिज रहे। इसके बाद अन्नाद्रमुक में उत्तराधिकार की लड़ाई शुरू हुई और इस अस्थिरता का फायदा उठाकर साल 1989 के चुनाव में करुणानिधि फिर विजयी हुए, लेकिन वह केवल दो साल तक शासन कर सके। उनकी सरकार को जनवरी 1991 में चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने लिट्टे का समर्थन करने के आरोप में बर्खास्त कर दिया। इसके बाद मई 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की श्रीपेरंबदूर में लिट्टे ने हत्या कर दी।
राजनीतिक परिदृश्य में इस बदलाव ने मूवी स्टार जे जयललिता को आगे बढ़ने का मौका दिया और वह मुख्यमंत्री बनीं, पर पांच साल ही टिक सकीं। भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद वह सत्ता से बाहर हो गईं। इस मोड़ पर तमिलनाडु की राजनीति द्वि-ध्रुवीय हो गई और द्रमुक और अन्नाद्रमुक बारी-बारी से शासन करने लगे। यह सिलसिला 2006 में उस समय बदल गया, जब अभिनेता विजयकांत ने चुनावी राजनीति में दस्तक दी। हालांकि, उनकी पार्टी को 8.1 प्रतिशत वोट मिले थे, मगर वह अपनी सीट छोड़कर बाकी सभी सीटें हार गए थे। अगले चुनाव में 29 सीटें जीतकर वह विपक्ष के नेता बने।
टीवीके के राजनीति में प्रवेश के लिए लंबे समय से माहौल बन रहा था। उनके प्रवेश से 2026 का चुनाव तीन दिशाओं में मुड़ सकता है। कुछ पर्यवेक्षकों का मानना है कि विजय एमजीआर और विजयकांत जैसी स्थिति में हैं, लेकिन क्या वह एमजीआर और विजयकांत के प्रदर्शन को दोहरा सकते हैं? जयललिता और करुणानिधि जैसे दो दिग्गजों की मौत के बाद से तमिलनाडु की राजनीति में जबर्दस्त उथल-पुथल मची हुई है। 2016 में अन्नाद्रमुक के पलानीसामी और 2021 में एमके स्टालिन ने कुछ हद तक द्वि-ध्रुवीयता को वापस लाने का माहौल बनाया व भाजपा ने मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश तो की, पर सफलता नहीं मिली है।
विजय राज्य के युवा मतदाताओं को आकर्षित कर रहे हैं, तो क्या यह माना जा सकता है कि बदलाव आने वाला है? युवा वोटर हमेशा राजनीति के रडार पर रहे हैं, क्योंकि वे परिपक्व पार्टियों की तुलना में अधिक प्रभावी होते हैं। वे आसानी से ऊब जाते हैं और किसी को भी समर्थन देने के लिए तैयार हो जाते हैं। इससे उम्मीद होती है कि वह राजनीति की प्रकृति को बदल सकते हैं। विभिन्न दलों के नेता महिला मतदाताओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। विजय ने देर से शुरुआत की है और पर्याप्त जमीनी काम नहीं किया है। वह वोट में तो सेंध लगाएंगे, पर बड़ी छाप छोड़ने के लिए उन्हें और काम करना होगा।
यद्यपि भाजपा और अन्नाद्रमुक ने समझौता कर रखा है, पर भगवा नेता अन्नामलाई को ज्यादा फायदा मिलने की संभावना नहीं है। इसी तरह, डीएमके और कांग्रेस में अभी भी खींचतान चल रही है और राहुल गांधी को तमिलनाडु जाने का समय नहीं मिला है। दलित पार्टी ‘वीसीके’ अनिश्चित है, क्योंकि उसके युवा कार्यकर्ता विजय की ओर आकर्षित हो रहे हैं। इसलिए राज्य की राजनीति में अभी कई चीजें असंभव लग रही हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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