अपनी बेटियों का बल बढ़ाते हुए ही आगे बढ़ेगा बिहार

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बिहार के शिक्षा मंत्री ने सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की उपस्थिति और उनकी शिक्षा की अहमियत को लेकर जो सवाल उठाए हैं, उस पर लोगों में नाराजगी है और यह जायज भी है। एक मंत्री से और वह भी शिक्षा मंत्री से बेहतर समझ…

अपनी बेटियों का बल बढ़ाते हुए ही आगे बढ़ेगा बिहार

माया दारूवाला,वरिष्ठ मानवाधिकार सलाहकार

बिहार के शिक्षा मंत्री ने सार्वजनिक जीवन में महिलाओं की उपस्थिति और उनकी शिक्षा की अहमियत को लेकर जो सवाल उठाए हैं, उस पर लोगों में नाराजगी है और यह जायज भी है। एक मंत्री से और वह भी शिक्षा मंत्री से बेहतर समझ की उम्मीद की जाती है।

शिक्षा मंत्री खुद मगध यूनिवर्सिटी के एक कॉलेज से अर्थशास्त्र में स्नातक हैं और पटना के एक कोचिंग सेंटर में पढ़ाते रहे हैं, इसलिए वह पढ़ाई के महत्व को अच्छे से समझते हैं। रोजगार को शिक्षा से जोड़ने की उनकी कोशिशों की तारीफ भी हुई है, लेकिन चिंता की बात यह है कि शिक्षा को अक्सर एक दकियानूस विचारधारा से जोड़ दिया जाता है। उनका हालिया बयान इसी विचारधारा के अनुरूप है। शिक्षा मंत्री की यह बात प्रधानमंत्री की उस सोच के बिल्कुल खिलाफ है, जिसमें वह विकसित भारत के लिए ‘महिला-नेतृत्व वाले विकास’ को एक केंद्रीय और अनिवार्य तत्व के रूप में बार-बार प्रस्तुत करते हैं। अगर स्त्रियों को दोबारा घरों की चारदीवारी में कैद कर दिया गया, उन्हें पसंद का रोजगार चुनने के मौके नहीं मिले, तो विकसित भारत का सपना कैसे पूरा होगा?

नीतीश कुमार के शासनकाल में विकास की सबसे बड़ी उम्मीद इस बात से जगी कि उन्होंने लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा दिया। 2000 के दशक की शुरुआत से 2010 के दशक के मध्य तक माध्यमिक स्कूलों में लड़कियों के दाखिले का प्रतिशत 55-60 से बढ़कर करीब 75-80 फीसदी हो गया। उनकी साइकिल योजना ने देश भर का ध्यान खींचा। यह योजना पुरानी सोच की जकड़न से बाहर निकलकर, सुनहरे अवसरों और तरक्की की दुनिया में कदम रखने का क्रांतिकारी संकेतक थी। इस सोच के खिलाफ जाना न सिर्फ समानता, बल्कि बिहार के विकास और सामाजिक कल्याण के लिए भी एक त्रासदी होगी।

बिहार में कुल बेरोजगारी दर लगभग 10-12 प्रतिशत है। वहीं महिलाओं के मामले में यह करीब 20 से 25 प्रतिशत के बीच है, जबकि राष्ट्रीय औसत 12-15 फीसदी है। कहने की जरूरत नहीं कि जहां महिलाओं को रोजगार मिला भी है, वहां वे निचले पदों पर कार्यरत हैं और उनकी तनख्वाह भी कम है। इसके बावजूद पिछले दो दशकों में नीतीश कुमार के शासनकाल में महिलाओं के रोजगार में लगभग पांच प्रतिशत की वृद्धि हुई। यह मुख्य रूप से शिक्षा के कारण संभव हो पाया।

बिहार की 12 करोड़ की आबादी देश की जीडीपी में करीब आठ प्रतिशत का योगदान देती है। इसकी तुलना में देखें, तो महाराष्ट्र का योगदान, जिसकी आबादी लगभग बिहार के बराबर है, करीब 15 प्रतिशत है। वहां कार्यबल में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 20 फीसदी है। महाराष्ट्र में महिलाएं औसतन 12-14 वर्षों की शिक्षा प्राप्त करती हैं और निस्संदेह इसने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसलिए अगर बिहार में शिक्षित महिलाओं को कार्यबल में शामिल किया जाए, तो राज्य की जीडीपी मध्यम अवधि में दोगुनी हो सकती है। बस शर्त यह है कि लड़कियों की पढ़ाई व नौकरी तक पहुंच उसी गति से बढ़ती रहे, जैसी पिछले सालों में देखी गई है।

पारंपरिक पारिवारिक मूल्यों का सम्मान अच्छी बात है, पर यह स्त्रियों को घर में कैद करने पर आधारित नहीं हो सकता। घर हमेशा स्त्रियों के लिए सुरक्षित ठिकाना नहीं होता। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की ‘क्राइम इन इंडिया’ रिपोर्ट (2024-25) के आंकड़े इसकी तस्दीक करते हैं। बिहार में महिलाओं के खिलाफ होने वाले लगभग आधे अपराध, जैसे बलात्कार, दहेज प्रताड़ना व उत्पीड़न, घर के भीतर ही होते हैं। संख्या के मामले में यह राष्ट्रीय औसत से अधिक है और एक दशक पहले की तुलना में इसमें बढ़ोतरी हुई है। दर्ज अपराधों की बढ़ती संख्या यह भी दिखाती है कि महिलाएं अब अपने उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने को तत्पर हैं और प्रशासन भी इस पर कार्रवाई के लिए बेहतर रूप से तैयार है।

महिलाओं के खिलाफ किसी भी टिप्पणी को महज ‘जुबान फिसलना’ कहकर टाला नहीं जा सकता। यह उन्हें अधीन बनाए रखने और कमतर समझने वाली एक प्रतिगामी सोच है। बिहार को ऐसे प्रशासन की जरूरत है, जो यह समझे कि आधी आबादी को पीछे धकेलकर राज्य का भविष्य नहीं बनाया जा सकता।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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