
घरेलू मांग बढ़ाने में मनरेगा सबसे ज्यादा मददगार
संक्षेप: इस महीने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के दो दशक पूरे हो रहे हैं। ग्रामीण परिवारों तक पहुंचने के मामले में यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के बाद दूसरी सबसे बड़ी जन-हितकारी योजना है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की पहली सरकार के दौरान लागू…
हिमांशु, एसोशिएट प्रोफेसर, जेएनयू
इस महीने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के दो दशक पूरे हो रहे हैं। ग्रामीण परिवारों तक पहुंचने के मामले में यह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के बाद दूसरी सबसे बड़ी जन-हितकारी योजना है। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की पहली सरकार के दौरान लागू इन दोनों ही कानूनों ने सामाजिक सुरक्षा का ढांचा अधिकार-आधारित बनाया। पिछले दो दशक में मनरेगा के क्रियान्वयन में कई बदलाव हुए हैं, मगर सामाजिक सुरक्षा के लिहाज से यह ग्रामीण भारत में आज भी सबसे अहम योजना बनी हुई है।
लाखों गरीबों को रोजगार दिलाने की केंद्र सरकार की पुरानी योजनाओं से मनरेगा तीन मायनों में अलग थी। पहला, चूंकि इसे संसद ने कानून के रूप में पारित किया था, इसलिए यह कानूनी रूप से अधिकार-संपन्न है और सरकारों की मनमानी से मुक्त। दूसरा, इस योजना में देश भर के ग्रामीण इलाकों में मांग के आधार रोजगार मिलता है, इसलिए इसमें लक्ष्य संबंधी गड़बड़ियां नहीं रहीं, जो सरकारी कार्यक्रमों में नत्थी होती हैं। तीसरा, इसने गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन जैसे प्रत्यक्ष लाभों से कहीं अधिक परोक्ष लाभ दिए हैं। हालांकि, इसका प्राथमिक उद्देश्य ग्रामीण श्रमिकों को अकुशल रोजगार प्रदान करना रहा है, पर इसने ग्रामीण श्रम बाजार में महत्वपूर्ण बदलाव किए हैं। मनरेगा के अंतर्गत मजदूरी करने वालों में आधे से अधिक महिलाएं हैं। इनमें दलित व आदिवासी श्रमिकों की भागीदारी लगभग एक-चौथाई रही है, जो काफी अधिक है।
इस योजना के कारण परोक्ष रूप से बुनियादी ढांचे का निर्माण हुआ, जिससे ग्रामीण उत्पादकता बढ़ी। ग्राम स्तरीय सिंचाई परियोजनाओं, ग्रामीण सड़कों के निर्माण से बाजार तक पहुंच, मृदा संरक्षण आदि के माध्यम से कृषि में परोक्षत: अनगिनत फायदे हुए हैं, जिससे कृषि उत्पादकता को बढ़ाने में मदद मिली। कई जगह इस तरह के काम वंचित समुदायों से जुड़ी जमीनों पर किए गए, जिससे सबसे गरीब किसानों की कृषि उत्पादकता बढ़ी है। दूसरा, मनरेगा ने सामान्य मजदूरी बढ़ाने और ग्रामीण गरीबी कम करने में मदद की है। कई अध्ययनों में यह निष्कर्ष निकला है कि इस योजना के कारण 2008-2013 के बीच सामान्य मजदूरी में छह प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि हुई। इसने न केवल सबसे गरीब लोगों की आय बढ़ाई, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मांग भी बढ़ी।
दुर्भाग्यवश, यूपीए-2 से ही यह कार्यक्रम कमजोर होता गया। 2011-12 के बाद मनरेगा मजदूरी को बाजार भाव से कम कर दिया गया। तब से स्थिति और खराब हो गई है और 2023 में 20 राज्यों में मनरेगा मजदूरी बाजार दर से कम आंकी गई। 2014 के बाद से कई अन्य बदलाव भी हुए हैं, जो मजदूरी भुगतान, बायोमेट्रिक प्रामाणीकरण और राज्यों में प्रशासनिक शर्तों से जुड़े हैं। इन सबसे यह योजना लगभग ठहर-सी गई है। पश्चिम बंगाल में तो केंद्र के साथ खींचतान के चलते इसे दो साल के लिए निलंबित ही कर दिया गया। हालांकि, सामान्य मजदूरी से कम होने के बावजूद भारत के लगभग एक-तिहाई ग्रामीण परिवार मनरेगा के तहत काम कर रहे हैं। इस कार्यक्रम की सफलता का प्रमाण कोविड महामारी के दौरान स्पष्ट रूप से दिखा, जब लाखों बेरोजगार हाथों को मांग के अनुरूप इस योजना के तहत काम मिला। फिर भी, यह प्रशासनिक उदासीनता (केंद्र और राज्यों दोनों की ओर से) से ग्रस्त है, जिस कारण ग्रामीण संकट और भी बदतर हो गया है।
वर्तमान में ग्रामीण मजदूरी और किसानों की आमदनी में स्थिरता के कारण, ग्रामीण अर्थव्यवस्था कमजोर हो चुकी है। मनरेगा इसे पुनर्जीवित कर सकती है। इस योजना के तहत होने वाले कामों से ग्रामीण मजदूरी व उत्पादकता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और इससे खपत संबंधी मांग बढ़ाने में मदद मिलेगी। दूसरे शब्दों में कहें, तो इस योजना ने 2008 के वैश्विक मंदी और कोरोना महामारी के दौरान अपनी उपयोगिता व महत्ता साबित की है। यह फिर से ऐसा कर सकती है, यदि राज्य और केंद्र मिलकर काम करें। ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दुर्दशा को देखते हुए मनरेगा को उसके मूल उद्देश्यों के अनुरूप आगे बढ़ाना न केवल हमारी राजनीतिक आवश्यकता है, बल्कि आर्थिक अनिवार्यता भी है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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