पढ़े-लिखे दलिताें से बहुत निराश रहे बाबा साहब

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हिंदी, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगू आदि भाषाओं में दलित लेखकों द्वारा रचे जा रहे साहित्य की एक विशेषता यह है कि लेखक अपनी रचनाएं अप्रैल में ही प्रकाशित कराना चाहते हैं। यह संयोग ही है कि दलितों में मुक्ति चेतना…

पढ़े-लिखे दलिताें से बहुत निराश रहे बाबा साहब

श्यौराज सिंह बेचैन,पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, दिल्ली विवि

हिंदी, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगू आदि भाषाओं में दलित लेखकों द्वारा रचे जा रहे साहित्य की एक विशेषता यह है कि लेखक अपनी रचनाएं अप्रैल में ही प्रकाशित कराना चाहते हैं। यह संयोग ही है कि दलितों में मुक्ति चेतना का बीजारोपण करने और इंसानी हकूक के लिए संघर्ष करने वाले कई नायकों के जन्मदिन अप्रैल में ही आते हैं। 5 अप्रैल को बाबू जगजीवन राम, 11 अप्रैल को महात्मा ज्योतिराव फुले और 14 अप्रैल को बाबा साहब डॉ भीमराव आंबेडकर पैदा हुए थे।

बात दो सौ साल पूर्व पैदा हुए लेखक और सुधारक ज्योतिराव फुले से शुरू करते हैं। उन्हें भी जाति-व्यवस्था द्वारा अस्पृश्यता का स्वाद चखाया गया था। हालांकि, वह अछूत नहीं , शूद्र थे और एक संपन्न माली परिवार में पैदा हुए थे। जब वह अपने ब्राह्मण मित्र की शादी में गए, तो उन्हें ‘बेआबरू’ कर बारात से बाहर कर दिया गया। फुले तार्किक साहित्यकार बने और ‘सत्यशोधक समाज’ नामक संस्था की स्थापना की। फुले की किताब गुलामगिरी बाहरी गुलामी से अधिक भीतरी गुलामी और धार्मिक संदर्भों से भरी है। उन्होंने किसानों, अस्पृश्यों व स्त्रियों की समस्याओं, अशिक्षा, बाल-विवाह के विरोध और विधवा पुनर्विवाह को लेकर अपनी पत्नी सावित्रीबाई फुले को आगे बढ़ाया और स्त्री शिक्षा का आधारभूत कार्य किया। 28 नवंबर, 1890 को फुले की मृत्यु के साथ समाज परिवर्तन की जो कड़ी टूटी, वह 14 अप्रैल, 1891 को डॉ भीमराव आंबेडकर के जन्म के साथ फिर से जुड़ गई।

आंबेडकर से स्कूल में साथ बैठने पर घृणा की गई। पिता से मिलने गए, तो सातारा स्टेशन से बैलगाड़ी में ले जाने से इनकार किया गया। बड़ौदा राज्य की सेवा में गए, तो कार्यालय के कर्मचारियों द्वारा बहिष्कार किया गया। पारसी सराय में जाति पहचानकर उनका सामान बाहर फेंक दिया गया और राज्य में कहीं रहने की जगह भी नहीं मिली। उन्हें ऐसे कटु अनुभवों से गुजरना पड़ा। डॉ आंबेडकर ने हार नहीं मानी और चावदार तालाब पर जल अधिकार और कालाराम मंदिर प्रवेश के लिए आंदोलन चलाया। साल 1931 के ‘गोलमेज सम्मेलन’ में उन्होंने अछूतों के प्रतिनिधि के तौर पर हिस्सा लिया और भारत के संविधान निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाई।

डॉ आंबेडकर ने महिलाओं के हक के लिए ‘हिंदू कोड बिल’ का प्रारूप पेश किया, तो उन्हें प्रसूति अवकाश दिलाने, श्रमिक महिलाओं के बच्चों के लिए पालनाघर बनवाने, महिला कर्मियों को पुरुषों के समान वेतन दिलाने का कार्य किया। उन्होंने अनुसूचित जातियों के लिए पृथक निर्वाचन की मांग की, मगर समर्थन न मिलने पर ‘पूना पैक्ट’ के तहत विधायिका में उनके लिए स्थान आरक्षित कराया। बाबा साहब यहीं नहीं रुके, उन्होंने अस्पृश्यता को जुर्म बनाया व ‘बहिष्कृत जातियों’ को ईसाइयत व इस्लाम धर्म ग्रहण करने से रोककर वैकल्पिक रास्ते के तौर भारतीय मूल के बौद्ध धर्म में दीक्षित कराया।

जिन ‘बहिष्कृत जातियों’ को उन्होंने आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा दी, उनके सामाजिक होने के बजाय वैयक्तिक सरोकारों में सिमटने का दुखद अंदेशा भी बाबा साहब को पहले ही हो गया था। 18 मार्च, 1956 को आगरा की एक आमसभा में उन्होंने भारी मन से कहा, ‘मुझे हमारे पढ़े-लिखे लोगों ने बहुत धोखा दिया है। आशा थी कि ये उच्च शिक्षा प्राप्त कर समाज की सेवा करेंगे, किंतु मैं देखता हूं कि गुलाम मानसिकता के क्लर्कों की भीड़ एकत्र हो गई है, जो समाज का सामूहिक उत्थान करने के बजाय अपना पेट पालने में लगी हुई है।’ यही नहीं, मार्च 1978 में उन्होंने यह भी कहा था, ‘मेरी स्थिति तंबू के नीचे लगे बंबू जैसी हो गई है। मुझे डर है, इस आंदोलन रूपी तंबू के नीचे से बंबू रूपी मेरे निकल जाने के बाद कहीं यह तंबू धराशायी न हो जाए।’

उन्हें इसका आभास हो ही रहा था कि 6 दिसंबर, 1956 को उनका परिनिर्वाण हो गया। इसके साथ ही दलित-वंचित जातियों के सिर से सबसे बड़े अभिभावक का साया उठ गया। फुले-आंबेडकर ने अपने लेखन व संगठन के माध्यम से लिखने-सोचने और संगठित आवाज उठाने की जो प्रेरणा दी, वे वंचित तबकों के लिए आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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