हमारी अर्थव्यवस्था की कठिन परीक्षा ले रहा यह युद्ध
अमेरिका-ईरान की वार्ता के बेनतीजा निकलने से एक बार फिर दुनिया उसी मुहाने पर आ खड़ी हुई, जहां वह 8 अप्रैल से पहले थी। इन दोनों में से एक ने भी अस्थायी युद्ध-विराम का पालन नहीं किया, तो आग फिर से भड़क सकती है…

आलोक जोशी, वरिष्ठ पत्रकार
अमेरिका-ईरान की वार्ता के बेनतीजा निकलने से एक बार फिर दुनिया उसी मुहाने पर आ खड़ी हुई, जहां वह 8 अप्रैल से पहले थी। इन दोनों में से एक ने भी अस्थायी युद्ध-विराम का पालन नहीं किया, तो आग फिर से भड़क सकती है। नतीजा क्या होगा इसका, नमूना पूरी दुनिया देख चुकी है। मुमकिन है कि दोनों ही पक्ष युद्ध-विराम की शर्तों को अपने पक्ष में करवाने के लिए दबाव बनाते रहें, लेकिन युद्ध की तरफ शायद तय अवधि तक न लौटें। हालांकि, इस परिस्थिति में भी दुनिया को इस युद्ध की कीमत लंबे समय तक चुकानी पड़ेगी और जब कीमत चुकाने का सवाल उठता है, तो फिर सबको अपना-अपना हिसाब भी लगाना होगा।
भारत के लिए यह बहुत ही बड़ा सवाल है। होर्मुज जलमार्ग के बंद होने के कारण तेल-गैस की महंगाई का असर तो जगजाहिर है, पर पश्चिम एशिया के देशों से व्यापार ठप होना, परिवहन की लागत बढ़ जाना, रुपये में कमजोरी से चालू खाते पर दबाव, निर्यात के रास्ते में अड़चनें और ईरान व अरब देशों में बसे भारतीयों से आने वाले पैसे (रेमिटेंस) में कमी भी अर्थव्यवस्था के लिए बुरी खबर है। साफ दिख रहा है कि युद्ध-विराम के एलान के बाद भी होर्मुज से जहाजों का आना-जाना हाल-फिलहाल में सामान्य नहीं हो सकेगा। जहां रोज 140 जहाज आर-पार होते थे, वहां युद्धविराम के शुरुआती दो दिनों में गिनती सात के आंकड़े पर अटकी थी। इसीलिए भारत की नजर से सबसे बड़ा सवाल यही है कि तेल और गैस की आपूर्ति कितनी जल्दी पटरी पर लौटती है। अगर होर्मुज का रास्ता अटका रहा, तब तो युद्धविराम के बावजूद नुकसान का मीटर चलता रहेगा।
परेशानी कितनी बड़ी हो सकती है, इसका अंदाजा लगाने के लिए यह समझना चाहिए कि इस युद्ध से प्रभावित इलाके, यानी पश्चिम एशिया से भारत का कितना लेन-देन है? ताजा अनुमानों के मुताबिक, भारत की जरूरत का 55 प्रतिशत कच्चा तेल इन्हीं देशों से आता है, भारत के कुल निर्यात का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा यहीं से जाता है और भारत में आने वाली रेमिटेंस का 38 प्रतिशत इसी इलाके से आता है। अगर यह युद्ध-विराम किसी कारण से टूटता है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा जोखिम होगा। इससे महंगाई और चालू खाते का घाटा बढ़ने का डर है। अनुमान लगाए गए हैं कि अगर वित्त वर्ष 26-27 में तेल का औसत दाम 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास टिक जाता है, तो देश के चालू खाते का घाटा 1.9 से 2 प्रतिशत तक जा सकता है, जबकि मौजूदा अनुमान 0.7 से 0.8 प्रतिशत का है। ऐसे में, भारत की विकास दर गिरकर 6.6 प्रतिशत रह सकती है, जबकि महंगाई 4.1 प्रतिशत पर रहने का अनुमान है।
यदि तेल का औसत दाम 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया, तो हालात काफी बदल जाएंगे। अभी पिछले हफ्ते ही रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष के लिए 6.9 प्रतिशत वृद्धि और 4.6 प्रतिशत औसत महंगाई का अनुमान दिया है, लेकिन यह अनुमान इस धारणा पर टिका है कि कच्चे तेल का औसत मूल्य 85 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहेगा। रिजर्व बैंक के अनुसार, यदि तेल कीमतें इस धारणा से 10 प्रतिशत ऊपर जाती हैं, तो महंगाई में लगभग आधा प्रतिशत और वृद्धि दर में 0.15 प्रतिशत की चोट लग सकती है। विश्व बैंक कुछ और सतर्क है। उसका कहना है कि वित्त वर्ष 26-27 में भारत की जीडीपी 6.6 प्रतिशत रह सकती है। हालांकि, उसका अनुमान है कि अगर तेल-गैस की आपूर्ति और इनके दाम सामान्य हो जाएं, तो वित्त वर्ष 2027-28 में भारत की वृद्ध दर 7.2 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
एक बड़ी राहत की बात यह है कि भारत के पास इतनी विदेशी मुद्रा मौजूद है कि 11 महीनों के आयात का इंतजाम हो सकता है। विश्व बैंक ने भी कहा है कि भारत के पास मजबूत मैक्रो बफर है, लेकिन बफर के बावजूद कीमत तो चुकानी पड़ती है। विदेशी निवेशकों ने पिछले कुछ हफ्तों में ही करीब 19 अरब डॉलर बाजार से निकाले, जिसके असर से रुपया डॉलर के सामने रिकॉर्ड स्तर तक गिरा। इस परिस्थिति में सरकार को करना यही चाहिए कि वह देश की ऊर्जा आपूर्ति, राजकोषीय नीति और खर्च के मोर्चे पर ऐसी तैयारी करे, ताकि आगे कोई संकट भारत को विकट स्थिति में न फंसा पाए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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