जुबान ही नहीं, जायके में भी लखनऊ बेमिसाल
संक्षेप: बादशाहों की सल्तनत समाप्त हुई, नवाबों के ठाठ गए, तो उनके शाही दस्तरख्वान के जायके आम आदमी को मयस्सर हुए। शाही दस्तरख्वान तैयार करने वाले खानसामा दुकान लगाकर बाजार में बैठ गए…
सुहेल वहीद,वरिष्ठ पत्रकार
बादशाहों की सल्तनत समाप्त हुई, नवाबों के ठाठ गए, तो उनके शाही दस्तरख्वान के जायके आम आदमी को मयस्सर हुए। शाही दस्तरख्वान तैयार करने वाले खानसामा दुकान लगाकर बाजार में बैठ गए। दिल्ली के करीम मुगल दरबार के बावर्ची थे, तो लखनऊ के टुंडे के जनक नवाब भोपाल के बावर्ची मंगल के पुत्र हाजी मोहम्मद अली लखनऊ आए और पुराने लखनऊ के अकबरी गेट के पास कबाब पराठे का रेस्तरां खोला।
नवाब वाजिद अली शाह के वंशज नवाब मीर जाफर अब्दुल्लाह कबाब को लखनऊ की तहजीब का हिस्सा मानते थे। लखनऊ की मिट्टी की नमी यहां के खानों में भी होती है। नवाबों के जमाने में बावर्ची टीम के मुखिया हकीम होते थे, हांडी सबसे पहले वही चखते थे, इसीलिए उनकी निगरानी में तैयार होने वाले पकवान नुकसान नहीं करते थे। हर नवाब और शहंशाह के यहां की अपनी खास डिश होती थीं, क्योंकि खाना पकाना ललित कला का बहुत अहम हिस्सा है। बड़े जतन और कलात्मकता के साथ इन खास पकवानों का सृजन किया जाता है।
नवाबी दौर में लखनऊ में दर्जनों तरह के कबाब की ईजाद की गई। काकोरी कबाब खालिस लखनऊ की देन है। गलावटी कबाब भी लखनवी है, कहीं नहीं मिल सकता। इन कबाबों की खास बात यह है कि ये कभी दवा के रूप में भी खाए जाते हैं। हकीम सफदर डायरिया के मरीजों को टुंडे कबाब दोनों टाइम खाने का नुस्खा दिया करते थे। टुंडे कबाब के मालिक मोहम्मद उसमान का तो यहां तक दावा है कि उनके कबाब 64 किस्म के मसालों का मिश्रण हैं। यूनानी दवा की तरह मसालों का अनुपात रखा जाता है, कबाब में संदल भी डाला जाता है, कुछ मसाले अभी भी सीधे ईरान से मंगाए जाते हैं। लखनऊ में मसालों की मंडी का नाम नेपाली कोठी है। लखनऊ के ‘काकोरी कबाब’ और टुंडे कबाब’ को यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल करने के लिए सबसे पहले व्यंजन विशेशज्ञ जिग्स कालरा ने लिखा था।
लखनऊ शायद दुनिया का इकलौता शहर है, जहां एक बावर्ची टोला है। यहां पर सैकड़ों बावर्ची खानदान रह रहे हैं। नवाबों के दौर में इसे बसाया गया। यहां के बावर्चियों के पासपोर्ट खाड़ी देश, यूरोप, कनाडा और अमेरिका के वीजे से भरे पड़े हैं। इनमें से भी ज्यादातर कुरैशी बिरादरी के हैं, जो मांस के व्यापारी हैं। उन्हें गोश्त की गहरी समझ है। बिरयानी में कौन सा गोश्त पड़ेगा और रोगन जोश में कौन सा, बोटी कबाब की खुश्बू में खटास न आए, यही कमाल करते हैं ये लोग।
लखनऊ में इदरीस की बिरयानी, जो अवधी पुलाव है, यह पोटली मसालों से बनती है, जिसमें पहले यखनी तैयार की जाती है और फिर चावल में तह पर तह लगाकर उसे दम किया जाता है। जाफरान, दूध और मलाई के बिना इनकी बिरयानी नहीं बनती। लल्ला की बिरयानी हो या वाहिद की बिरयानी, स्वाद अगर मुंह को लग गया, तो फिर हैदराबादी बिरयानी भी इसके आगे ज्यादा देर नहीं टिकती। ‘लखनऊ के शाही दस्तरख्वान’ मिर्जा जाफर हुसैन की एक मशहूर किताब है और यही अवध के व्यंजनों पर लिखी जाने वाली किसी भी किताब का मूल स्रोत है। मिर्जा खुद बहुत बड़े खानसामा थे।
अब मक्खन मलाई को लखनऊ की शान न कहें, तो क्या कहें? चौक का यह कुटीर उद्योग है, रुई के फाहे जैसी हल्की हवा में उड़ने को तैयार और मुंह में जाए, तो पता ही नहीं चलता कि कुछ खा भी रहे हैं। यह लखनऊ की आबो हवा का कमाल है। सुबह-सुबह पत्थर के कोयले की भट्टी से उतरते हुए रत्ती लाल के ‘खस्ते’ हरे पत्तों पर मटर और आलू की सब्जी के साथ जो मजा देते हैं, उसकी खुश्बू यूनेस्को के दफ्तर तक न पहुंच पाती, यह मुमकिन ही नहीं था। करीब 2016 से यूनेस्को की सर्च और सर्वे टीम के कई दल लखनऊ के व्यंजनों के मजे लूटने आए हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जिस ठंडाई के लिए लखनऊ को कभी नहीं भूलते थे, वह अपनी तहजीब और जायकों से जिंदा एक सभ्यता का दूसरा नाम है। यूनेस्को ने 31 अक्तूबर को समरकंद में अपने 43वें सत्र के दौरान लखनऊ को औपचारिक रूप से पाक-कला के रचनात्मक शहर का दर्जा दिया है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लखनऊ के व्यंजन से लुत्फअंदोज होने की बात की है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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