अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन ने रखी आजादी की नींव

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आज से ठीक 84 साल पहले 9 अगस्त, 1942 को देश की सड़कों पर ऐसा जनसैलाब उमड़ आया था, जिसकी स्मृतियां आज भी भारतीयों को प्रेरित करती हैं। 9 अगस्त को ही ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की शुरुआत हुई थी…

अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन ने रखी आजादी की नींव
RAJNI CHANDIWAL

रजनी चांदीवाल, इतिहासकार एवं सहायक प्रोफेसर

आज से ठीक 84 साल पहले 9 अगस्त, 1942 को देश की सड़कों पर ऐसा जनसैलाब उमड़ आया था, जिसकी स्मृतियां आज भी भारतीयों को प्रेरित करती हैं। 9 अगस्त को ही ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की शुरुआत हुई थी। 15 अगस्त, 1947 को मिली आजादी की नींव इस आंदोलन ने पुख्ता कर दी थी।

यह आंदोलन देश के इतिहास का एक ऐसा अनोखा आंदोलन था, जो उस वक्त के अग्रणी नेताओं के बिना चला, इसीलिए यह आज भी जन-आंदोलनों के लिए एक मिसाल है और सबक भी कि आम जनता अगर कुछ ठान ले, तो वह अत्याचारी शासन के सामने भी असंभव को संभव कर सकती है। यह आंदोलन आम जनता की शक्ति का प्रतीक भी है। 1940 का दशक भारत और विश्व, दोनों के लिए मुश्किल दौर था। जहां दूसरा विश्व-युद्ध अपने चरम पर था, वहीं ब्रिटिश सरकार की युद्धकालीन पाबंदियों के चलते आम भारतीय की दशा बद से बदतर होती जा रही थी। खाने-पीने की चीजों के दाम आसमान छू रहे थे। बर्मा (म्यांमार) से आने वाले चावल की आपूर्ति बंद कर दी गई थी। खराब फसल व युद्ध प्रबंधन के चलते कर (टैक्स) भी लोगों पर बढ़ा दिए गए थे।

इन हालात में जब ब्रिटिश हुकूमत ने बिना सलाह-मशविरा किए भारत को भी ब्रिटेन के साथ द्वितीय विश्व युद्ध में शामिल कर लिया, तब महात्मा गांधी और कांग्रेस ने यह मांग रखी कि युद्ध में सहायता के बदले में भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दी जाए। लॉर्ड लिनलिथगो ने, जो उस समय भारत में वायसराय थे, इस मांग को सिरे से खारिज कर दिया और कई युद्धकालीन प्रतिबंध लगा दिए गए। भारत को जबरन युद्ध में झोंकने के लिए जब महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की और ‘करो या मरो’ का नारा दिया, तब कांग्रेस के तमाम शीर्ष नेताओं को लिनलिथगो ने बिना कोई देरी किए तत्काल गिरफ्तार करवा दिया। हालांकि, उसके बाद जो हुआ, उसके लिए वायसराय बिल्कुल तैयार न थे, मगर तीर कमान से निकल चुका था।

भारत के अलग-अलग शहरों में स्वत: जन-आंदोलन उभरने लगे। 9 अगस्त को बंबई (मुंबई), गुजरात, संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश), मध्य प्रांत, दिल्ली, बिहार, उड़ीसा (ओडिशा), बंगाल, मद्रास और पंजाब में जनजीवन लगभग ठप हो गया, व्यापारिक गतिविधियां बंद कर दी गईं। पूरे देश में सड़कों पर जुलूसों और विरोध-प्रदर्शनों की बाढ़-सी आ गई। बिना नेतृत्व के आंदोलन में आम भारतीयों की इतनी विशाल भागीदारी से ब्रिटिश हुकूमत बौखला गई। जब लोगों ने अपने शांतिपूर्ण प्रदर्शन से हटने से मना कर दिया, तब शासन के दमन का चक्र शुरू हुआ। सिर्फ दिल्ली में 11-12 अगस्त को पुलिस ने 27 बार प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की। इसमें 76 लोगों की मृत्यु हो गई और 100 से अधिक घायल हुए।

लिनलिथगो को शायद कांग्रेस के आंदोलन के भड़कने की आशंका थी, इसीलिए 8 अगस्त, 1942 को उन्होंने गवर्नरों को भेजे अपने पत्र में लिखा था- ‘मेरा अचूक विश्वास है कि अगर वर्तमान हालात में कांग्रेस का कोई भी गुट या वर्ग (ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध) युद्ध घोषित करता है, तो उसका एकमात्र संभव उत्तर उसे (संगठन को) पूरी तरह से कुचल देना है।’ हालांकि, जैसे-जैसे हुकूमत का जुल्म बढ़ा, लोगों का गुस्सा फूटता गया। यह आंदोलन आम लोगों में एक मनोवैज्ञानिक बदलाव लेकर आया। महात्मा गांधी जैसे राष्ट्रीय नेता ने ऐलान किया कि इस आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए औरत व आदमी स्वतंत्र हैं। इससे आम लोगों में व्यक्तिगत तौर पर देश के लिए एक जिम्मेदारी की भावना पैदा हुई।

विद्यार्थी, मजदूर और किसान इस जन-लहर का नेतृत्व करने के लिए आगे आए। कारखानों, कॉलेजों और स्कूलों में हड़तालें हुईं। पुलिस थानों, डाकघरों और रेलवे स्टेशनों में, जो उन दिनों औपनिवेशिक सत्ता के घृणित प्रतीक माने जाते थे, आग लगा दी गई या उनको क्षतिग्रस्त कर दिया गया। इस आंदोलन की उग्रता व व्यापकता को देखकर ब्रिटिश सरकार स्तब्ध रह गई थी। विंस्टन चर्चिल को भेजे गए एक निजी तार में लिनलिथगो ने चिंता जताते हुए लिखा, ‘यह 1857 की बगावत के बाद अब तक का सबसे गंभीर विद्रोह है।’ उन्होंने आगाह किया कि ‘अब तक यह आंदोलन सैन्य-सुरक्षा के कारणों से दुनिया से छिपाकर रखा था, पर अब इसे और इसके विस्तार को गंभीरता से लेने की जरूरत है।’

युद्ध-काल में मौजूद सेना का उपयोग किया गया। भीड़ को ‘नियंत्रित’ करने के लिए पुलिस व सेना ने अंधाधुंध गोलीबारी की। 1943 के अंत तक 91,836 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका था। इनमें सबसे अधिक संख्या बंबई प्रेसीडेंसी से थी (21,416), इसके बाद संयुक्त प्रांत (उत्तर प्रदेश) से 16,796 और बिहार से 16,202 लोग गिरफ्तार किए गए थे। ‘होम पॉलिटिकल फाइल्स’ के अनुसार, पुलिस और सेना की गोलीबारी में 1,060 लोगों की मृत्यु हुई थी। इस उभार को नियंत्रित करने के प्रयास में 63 पुलिसकर्मी मारे गए और 216 पुलिसकर्मी विद्रोहियों के पक्ष में चले गए थे।

भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत में 9 अगस्त को बंबई में एक परचा बांटा गया था, जिसमें ऐलान था-

‘यह हमारी आजादी की आखिरी लड़ाई है। आइए, ऐसा प्रतिरोध करें, जो सरकार की पूरी व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर दे।... विद्यार्थी (हम) भारतीय आकांक्षाओं की रीढ़ हैं। हमें संघर्ष करना चाहिए और तब तक करते रहना चाहिए, जब तक भारत आजाद न हो जाए। दुनिया की कोई भी शक्ति भारत को आजादी देने वाली नहीं है; हमें अपने साम्राज्यवादी शत्रु से अपनी आजादी खुद छीननी होगी। साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!

आजाद विद्यार्थी’

इस पर्चे की शपथ का ही नतीजा है कि आज हम आजाद भारत में भारत छोड़ो आंदोलन की वर्षगांठ मना रहे हैं। अगस्त क्रांति की सालगिरह हमें याद दिलाती है, हर भारतीय नेता है।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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