बाहरी कंपनियों पर निर्भर रहने से नुकसान होगा
बीती 31 मार्च को ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) ने धमकी दी कि वह ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमलों के जवाब में 18 प्रौद्योगिकी कंपनियों को निशाना बनाएगा। इनमें से ज्यादातर अमेरिकी कंपनियां हैं….

नितिन पई,निदेशक, तक्षशिला संस्थान
बीती 31 मार्च को ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) ने धमकी दी कि वह ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमलों के जवाब में 18 प्रौद्योगिकी कंपनियों को निशाना बनाएगा। इनमें से ज्यादातर अमेरिकी कंपनियां हैं। बाद में, उसने बहरीन स्थित अमेजन के डाटा सेंटर पर हमला किया भी।
यह एहसास ही बेहद चौंकाता है कि नागरिक-सैन्य जुड़ाव, नेटवर्क-केंद्रित युद्ध और एआई आधारित घातक हथियारों की वजह से प्रौद्योगिकी कंपनियां युद्ध में निशाना बन सकती हैं। हालांकि, असैन्य ढांचों पर हमला करने (जो युद्ध अपराध हो सकता है) और सैन्य अभियानों का हिस्सा बनने वाली निजी कंपनियों को निशाना बनाने (जो युद्ध अपराध नहीं है) के बीच एक बड़ा नैतिक और कानूनी अंतर है। अमेरिकी व इजरायली फौज ने बेशक ईरान के विश्वविद्यालयों और इस्पात संयंत्रों पर हमले किए, लेकिन उनके बारे में उन्होंने दावा किया कि वे ईरान की सैन्य क्षमता में योगदान दे रहे थे।
बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अपनी सरकारों के हाथों की कठपुतली बनना चाहिए या नहीं, यह फैसला उनके शेयरधारकों को लेना है, पर ईरान की धमकी और कार्रवाई से यही आभास होता है कि वे इस तरह के फैसलों की जद में आने से नहीं बच सकतीं। यहां भारत के लिए भी चुनौती कम नहीं है। नई दिल्ली को अपने रक्षा, सुरक्षा और आर्थिक ही नहीं, ऊर्जा से जुड़े ढांचों को भी विदेशी कंपनियों पर निर्भरता से मुक्त करने के लिए व्यवस्थित रूप से कदम बढ़ाना चाहिए। बेशक, यह आसान काम नहीं है, पर ऐसा करना निहायत जरूरी है। भारत के लिए अपने रक्षा खर्च को दोगुना करने की एक बड़ी वजह यह भी होनी चाहिए।
साल 2024 में, अमेरिका की सॉफ्टवेयर कंपनी ‘पलान्टिर’ के सीईओ एलेक्स कार्प ने अपनी किताब मेें कहा था कि ‘प्रौद्योगिकी क्षेत्र का यह दायित्व है कि वह उस राष्ट्र का समर्थन करे, जिसने उसके उदय को संभव बनाया’। उनके विचार में सिलिकॉन वैली का अस्तित्व और सफलता अमेरिकी सरकार की देन है, इसलिए उसे वाशिंगटन के भू-राजनीतिक एजेंडे का समर्थन करके इस ऐतिहासिक कर्ज को चुकाना चाहिए। चीन के साथ भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा को देखते हुए, प्रौद्योगिकी उद्योग के लिए अमेरिकी सरकार के साथ सहयोग करना जरूरी है, खास तौर से कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में अपनी अजेय पकड़ को मजबूत बनाने के लिए। कार्प इसके लिए प्रौद्योगिकी क्षेत्र की बौद्धिक संस्कृति की आलोचना करते हैं कि वह राष्ट्र व उसके उद्देश्य की अनदेखी करती है। वह सिलिकॉन वैली की आधुनिक पीढ़ी के नए अभिजात वर्ग के ध्वजवाहक है, जिसने स्थानीय राजनीतिक विकल्पों के अनुसार सफलतापूर्वक अपने व्यावसायिक हितों को ढाला है और वाशिंगटन की विदेश नीति के साथ तालमेल बनाया है। उनका कहना यह नहीं है कि प्रौद्योगिकी कंपनियों को अमेरिकी सेना का समर्थन करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करने से वैश्विक उदारवादी व्यवस्था को बढ़ावा मिलता है, बल्कि इसलिए कि अमेरिका असल में चीन, रूस, ईरान जैसे प्रतिद्वंद्वियों का सामना कर रहा है और पश्चिमी टेक कंपनियों का अपने देश के प्रति दायित्व है।
हालांकि, ऐसा सोचने वाले वह अकेले नहीं हैं। तकनीकी क्षेत्र के कई अन्य दिग्गजों ने भी अमेरिकी हितों के समर्थन में बयान जारी किए हैं। कुछ तो अमेरिकी सेना में शामिल भी हो गए हैं। यहां तक कि एंथ्रोपिक कंपनी ने भी यह एलान किया है कि वह सैन्य उपयोग से सहमत है और अमेरिका की रक्षा करने में विश्वास करती है। गौरतलब है कि यह वही कंपनी है, जिसका पेंटागन के साथ बड़ा विवाद हुआ था, जब उसने अपनी तकनीक का इस्तेमाल अमेरिकी नागरिकों की निगरानी करने और स्वचालित हथियारों को पावर देने के कामों में करने से मना कर दिया था।
इसका अर्थ यह है कि अमेरिकी टेक कंपनियों को वाशिंगटन की विदेश नीति का एक औजार मानना गलत नहीं होगा। ऐसा हमने तब भी देखा था, जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने यूक्रेन पर हमला बोला, तब माइक्रोसॉफ्ट ने अपने रूसी उपभोक्ताओं के लिए अपनी सेवाएं बंद कर दीं। इस लिहाज से भी देखें, तो बहुराष्ट्रीय या बाहरी कंपनियों पर निर्भरता खत्म करने को लेकर हमें अब संजीदगी दिखानी चाहिए।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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