श्वानों के साथ ऐसा सुलूक बिल्कुल ठीक नहीं
कुत्ते इस धरती पर तब से हैं, जब हमने उनको नाम भी नहीं दिया था। जब हमारे साथ रहने आए, तो उन्हें रहने की जगह दे ही सकते हैं...

मोहित चौहान, गायक, संगीतकार और अभिनेता
लावारिस कुत्तों की नसबंदी से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 28 जनवरी को राज्य सरकारों के रवैये पर जो टिप्पणी की, उससे यह मसला फिर से गरम हो गया है। मैं एक पशुप्रेमी हूं। साथ ही संगीतकार भी। जब छोटा था, तब संगीत ने मुझे सहारा दिया। इसने मुझे सिखाया कि खामोशी कैसे बोलती है, कैसे तड़प एक आवाज बन जाती है। मैं हिमालय की गोद में पला-बढ़ा, सरकारी नौकरी में रहे पिता के तबादलों के साथ-साथ ही मैंने यह समझ लिया कि यह दुनिया किसी की मिल्कियत नहीं, इस पर सबका बराबर का अधिकार है।
बाद के दिनों में संगीत ही मेरी जिंदगी बन गई। कुत्ते मेरे शिक्षक बन गए। शहरों और सीमाओं के निर्धारण के बहुत पहले से कुत्तों ने हमारा साथ दिया। वे जंगल से बाहर आए और हमारे साथ रह गए। भोजन या किसी फायदे के लिए नहीं, बल्कि हमारे साथ के लिए। वे हमारे साथ इसलिए रुके, क्योंकि उन्हें हम पर भरोसा था। पहाड़ों में, हम उन्हें कभी आवारा नहीं कहते थे। श्वान श्वान होते थे। वे वहीं रहते थे, जहां हम रहते थे। वहीं सोते थे, जहां हम सोते थे। वही खाते थे, जो हम खाते थे। हमारी करुणा कहीं से निर्देशित नहीं थी, बल्कि हमारी सहज प्रवृत्ति थी। हमारे धर्मग्रंथों में इसके बारे में बताया गया है। हमारे संविधान ने इसे याद रखा, बल्कि इससे भी अहम बात यह कि हमने दिल से इन्हें स्वीकार किया था।
जब मैं शहर आया, तो कुत्ते साथ आए। कंक्रीट और विध्वंस के बीच उन्होंने मेरा साथ दिया। उन्होंने मेरे कदमों की आहट पहचानी। मैंने उनके चेहरे पहचान लिए। हम साथ-साथ बड़े हुए। कोरोना महामारी के दौरान मेरा सामाजिक दायरा बढ़ गया। भूख लॉकडाउन नहीं समझती। डर सीमाओं को नहीं जानता। आज, मैं और मेरा परिवार कॉलोनियों और हरित पार्कों में 400 से ज्यादा कुत्तों की देखभाल करते हैं।
श्वानों पर पड़ोसी चिल्लाते हैं। उन पर पत्थर फेंके जाते हैं। सर्दियों की सुबह उन पर ठंडा पानी डाला जाता है। पूंछ में पटाखे बांध दिए जाते हैं। गर्म पानी से उनकी त्वचा जलाई जाती है। उनकी आजादी का अपहरण करने के लिए वैन आती हैं। कुत्ते कानून नहीं समझते। उनके साथ जब क्रूरता की जाती है, तब वे बस मुझे ऐसी निगाह से देखते हैं, जिनमें कोई आरोप नहीं होता। उनकी चुप्पी में बस यही सवाल होता है- ‘आखिर मेरा कुसूर क्या है?’ मैं उनके सिर पर हाथ फेरता हूं- ‘कुछ नहीं। तुम वहां सोए, जहां तुम्हें सुरक्षित महसूस हुआ। तुम भौंके, क्योंकि तुम डरे हुए थे। तुम दौड़े, क्योंकि तुम्हारे पैरों में अभी भी खुशियां जिंदा हैं।’ वे मेरा यकीन करते हैं। वे हमेशा करते हैं।
दूसरी तरफ, नफरत नई-नई भाषाओं में आती है और अग्रसारित संदेशों और चिंता में छिपे डर के जरिये फैलती है। लोग अपने वातानुकूलित कमरों में बैठकर तय करते हैं कि ये कुत्ते यहां के नहीं हैं। पार्कों में उनको घुसपैठिया कहा जाता है। उनके पानी पीने के पात्र तोड़ दिए जाते, आराम करने की जगहें ध्वस्त कर दी जाती हैं। हमसे अक्सर कहा जाता है कि हम ‘सरकार को यह काम क्यों नहीं सौंप देते?’ आप अपनी करुणा किसी को कैसे सौंप सकते हैं? आप अपनी अंतरात्मा को कैसे ‘आउटसोर्स’ कर सकते हैं? हमने उनकी दुनिया छोटी कर दी, हम लगातार उनकी जगहों पर कब्जा करते गए और फिर उनकी मौजूदगी को समस्या बता दिया। आप अपनी जिम्मेदारियों से मुंह चुराकर उससे हुए नुकसान के लिए श्वानों को सजा नहीं दे सकते!
श्वान हमें सिखाते हैं कि भरोसा कैसे किया जाता है, बिना किसी गारंटी के प्यार कैसे किया जाता है? जब हम अकेले पड़ जाते हैं, हमारी कोई नहीं सुन रहा होता, उस समय वे हमारा साथ देते हैं। जब कोई हमारा साथ नहीं देता, उस समय वे हमारी रक्षा करते हैं। वे एक ऐसी दुनिया में हमारे साथी हैं, जो तेजी से निर्मम होती जा रही है। उनको छिपाया नहीं जा सकता, न मिटाया जा सकता है। हमें चुनने के लिए उन्हें सजा नहीं दी जा सकती।
कुत्ते इस धरती पर तब से हैं, जब हमने उनका कोई नाम नहीं रखा था। अगर उन्होंने हमारे साथ रहने का फैसला किया है, तो कम से कम हम उन्हें रहने लायक जगह तो दे ही सकते हैं। आइए, करुणा को हम अपनी नीति बनाएं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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