अपनी बोली-बानी की ओर लौटने की जरूरत

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पिछले दिनों एक युवा कार्यक्रम के दौरान ‘स्टोरीटेलिंग सत्र’ में मैं कहानियां सुना रहा था। कहानी के बीच में मैंने जैसे ही अपने शहर की बोली में एक मुहावरेदार डायलॉग बोला, पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा, मानो सभागार में बैठा…

अपनी बोली-बानी की ओर लौटने की जरूरत

धनंजय चोपड़ा,मीडिया विशेषज्ञ

पिछले दिनों एक युवा कार्यक्रम के दौरान ‘स्टोरीटेलिंग सत्र’ में मैं कहानियां सुना रहा था। कहानी के बीच में मैंने जैसे ही अपने शहर की बोली में एक मुहावरेदार डायलॉग बोला, पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा, मानो सभागार में बैठा हर युवा अपनी बोली-बानी में कुछ सुनने का इंतजार कर रहा हो। फिर मैंने आगे की पूरी कहानी स्थानीय बोली में ही सुनाई, जो खूब पसंद की गई। एक-दो दिन में उस कहानी की अनगिनत रील बन गईं और वे सोशल मीडिया में छा गईं।

अपनी बोली-बानी की ओर लौटने का इससे बेहतर समय फिर नहीं आएगा, क्योंकि पहले नई शिक्षा नीति अपनी मातृभाषा में पढ़ाई और अब सीबीएसई त्रिभाषा फॉर्मूले की बात कह रहा है। ऐसे में, उम्मीद बंधती है कि अपनी बोली-बानी बचाने का काम पीछे आ रही पीढ़ियों के संग-साथ किया जा सकेगा। यूनेस्को दो बरस पहले से ही कह रहा है कि पिछले छह दशकों में भारत की 250 से अधिक भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं और 197 भाषाएं व बोलियां लुप्त होने के कगार पर हैं। तकनीक के भरोसे आगे बढ़ने के समय में पूरी दुनिया में भाषाओं-बोलियों का यही हाल है। भाषाओं पर काम करने वाले ‘एथनोलॉग’ के ताजा आंकड़े बताते हैं कि दुनिया की सात हजार में से 44 प्रतिशत भाषाएं और बोलियां अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही हैं।

बोली-बानी को संभाले रहने में भारत का अब तक का रिकॉर्ड दुनिया के अन्य देशों से कहीं बेहतर रहा है, लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की धमक के बाद मामला कुछ-कुछ बिगड़ता जा रहा है। बड़ी वजह है कि स्थानीय स्तर पर हमने अपनी बोली-बानी में किस्सागोई की परंपरा को नजरअंदाज किया है। एक समय था, जब किस्सागोई घर-घर का हिस्सा हुआ करती थी। घरों, परिवारों और मोहल्लों में बड़े-बूढ़ों की कहानियां-किस्से अपनी बोली-बानी में हुआ करती थीं। उनके स्थानीय शब्दों, मुहावरों और लोकोक्तियों की मजबूत थाती को सोशल मीडिया के प्रसार ने कमजोर कर दिया।

शोध बताते हैं कि अपनी बोली-बानी में किस्सागोई मानसिक सेहत को गहराई से प्रभावित करती है। वास्तव में, जिन बुजुर्गों को अकेलेपन का शिकार होने से हम रोक नहीं पा रहे हैं, उन्हें किस्सों के साथ लाने पर उनका आत्मविश्वास बढ़ा सकते हैं और सफल जीवन जीने के फलसफों की थाती को लगातार नया कर सकते हैं। पिछले दिनों कनाडा के एक विश्वविद्यालय के शोधार्थियों ने पाया कि जिन युवाओं के पास अपनी बोली-बानी की ताकत थी, वे आत्मविश्वास से जीवन बिता रहे थे और उनमें आत्महत्या की दर भी लगभग शून्य थी। इसी तरह का अध्ययन स्वीडन, ऑस्ट्रेलिया में भी हुआ, जहां लोगों ने अपनी भाषा में किस्सागोई को अपनाकर युवाओं में जीवन को बेहतर ढंग से जीने और कुछ नया करने के प्रति ललक बढ़ा दी।

भारतीय ज्ञान परंपरा में किस्सागोई या दास्तानगोई को बेहतरीन स्थान मिलता रहा है, लेकिन हमने टेक्नोलॉजी के साथ होड़ में अपनी इस विधा को कुछ मंचों तक सीमित कर दिया और वह भी कुछ लोगों तक। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि स्कूल-कॉलेजों में अपने इलाके की बोली-बानी में किस्सों को कहने वाले बुजुर्गों को आमंत्रित किया जाए और उनकी किस्सागोई से विद्यार्थियों को जोड़ा जाए? विद्यार्थियों को अपने गांव-परिवार-इलाके की संस्कृति से जुड़ी जानकारियों को अपनी स्थानीय बोली में किस्सों के रूप में सुनाने को प्रेरित किया जाए। इसमें ध्यान रखना होगा कि शब्दों और उनसे जुड़ी ध्वनियों तथा सांस्कृतिक आभाओं से विद्यार्थियों को कुछ इस तरह परिचित कराया जाए कि वे रोजमर्रा की बातचीत में उनके प्रयोग से हिचकिचाएं नहीं, बल्कि सामने वाले तक उसे संप्रेषित करें।

गौर कीजिए, जिन जगहों की अपनी बोली-बानी लुप्त हो गई, वहां का पारंपरिक ज्ञान प्रसार भी कमजोर हुआ है। इसलिए, समय आ गया है कि हम टेक्नोलॉजी का सही ढंग से प्रयोग करते हुए अपनी बोली-बानी को बचाने का प्रयास करें, साथ ही अपने बुजुर्गों की किस्सागोई को वापस पटरी पर लाने का काम करें, ताकि यह परंपरा निरंतरता पाने में पीछे न रहे और नए-नए किस्सागो तैयार होने से शब्दों की दुनिया बची रहे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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