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मैं, मेरे पैसे और मेरा बैंक

मैं उन लोगों में से हूं, जिन्हें बैंक से अपना पैसा निकालकर लाने में भी बड़ी खुशी होती है। पहले तो बैंक से पैसा निकालना यूं भी कठिन काम होता था। पहला संकट तो यह होता था कि न जाने क्यों अगले कुछ लोग बड़ी देर तक काउंटर पर खडे़ रहते थे। बाद में मुझे कुछ लोगों ने बताया कि ऐसा होता नहीं है, बल्कि हमें लगता है कि हमसे आगे वाले लोग बहुत वक्त लगा रहे हैं। लेकिन मुझे शक है कि बैंक वाले मेरे आने के पहले अपने परिचित लोगों को बुला लेते होंगे कि वह आने वाला है, जल्दी से लाइन में खडे़ हो जाओ। अक्सर इस तरह या तो लंच हो जाता था या फिर कैश खत्म हो जाती थी। नहीं तो मेरे दस्तखत मेरे ही दस्तखत से नहीं मिलते थे। कभी-कभी लगता था कि कोई जाली दस्तखत करने वाला नटवरलाल मिल जाए, तो मैं उससे अपने दस्तखत करवा लूं। या फिर उससे अपने दस्तखत करने ही सीख लूं।

अब तो एटीएम का जमाना आ गया है, लेकिन मेरा स्वभाव नहीं बदला। अब भी मुझे लगता है कि एटीएम मुझे कहां-कहां से, कैसे-कैसे लोग वाली नजरों से देख रही है। मैं खुद को समझाता हूं कि यह मशीन है, इसकी नजर में सब बराबर हैं। लेकिन मेरा मन नहीं मानता कि भले ही मशीन हो, यह मुझे और नीरव मोदी को एक ही नजर से देखती होगी? मुझे आज भी एटीएम की नजर में उन तमाम लड़कियों की नजर दिखाई देती है, जिन्हें मैं काफी हसरत से ताकता था, पर जो मेरे अस्तित्व को ही कभी स्वीकार नहीं करती थीं।

मुझे नीरव मोदी उस फिल्म स्टार की तरह दिखाई देता है, जिसके पीछे लड़कियां फिदा होकर घूमती हैं। यहां हम अपने दस्तखत खुद करके अपने खाते में जमा पैसा निकालने में ऐसा मानते हैं कि कोई मैदान फतह कर लिया है, उधर यह भाई बैंकों का पैसा लेकर चलता बना। उसके बारे में जानकर अब मुझे एटीएम से अपना पैसा निकालने में और ज्यादा अपराध बोध होने लगा है। 

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  • Web Title:Rajendra Dhrupapkar article in Nashtar column in hindustan on 7 march