Public tap, india - वीर रस की चाशनी में उबलते गुलाब जामुन DA Image

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वीर रस की चाशनी में उबलते गुलाब जामुन

आजकल हम जहां रहते हैं, वहां ऐसे दृश्य नहीं दिखते, लेकिन काफी पहले सार्वजनिक नलों पर होने वाली लड़ाइयां अब भी याद हैं। भारत में पानी भरने का काम महिलाएं ही करती हैं, इसलिए ऐसे नलों पर ज्यादातर महिलाएं ही होती थीं। लड़ाई आमतौर पर दो महिलाओं के बीच शुरू होती थी, और धीरे-धीरे सार्वजनिक हो जाती थी। फिर बनियान और पट्टों वाली ढीली चड्डी पहने और लाल दंतमंजन करता एकाध पुरुष भी उसमें शामिल हो जाता था। उसके बाद सिर्फ चड्डी पहने काला दंतमंजन करता दूसरा पुरुष भी शामिल हो जाता था। फिर बच्चे और अंत में मोहल्ले के कुत्ते भी उस चीख-पुकार में शामिल हो जाते थे और साउंड लेवल गगनभेदी हो जाता था।

इन दिनों जब मैं टीवी पर खबरें देखता हूं, तो मुझे वह दृश्य याद आता है। टीवी के एक या दो एंकर ही उतना शोर पैदा कर लेते हैं, जितना सार्वजनिक नल पर पूरा मोहल्ला पैदा कर पाता था। कुछ कमी रहती है, तो वह बैकग्राउंड म्यूजिक पूरी कर देता है। टीवी की खबरों के साथ डरावनी भूतहा फिल्मों वाला या युद्ध से संबंधित फिल्मों वाला संगीत बजाने का आइडिया जिसका भी हो, है बड़ा जोरदार।

आजकल खबरिया चैनल हर वक्त जंग के मूड में रहते हैं, और एंकर ऐसी मुद्रा में रहते हैं, जैसे हाथ में बाल्टी लेकर  नल वाली लड़ाई लड़ रहे हों। अगर लड़ने के लिए पाकिस्तान मिल जाए, तो फिर बात ही क्या है, वरना कोई भी गैर-भाजपाई नेता, नहीं तो एकाध बेरोजगार अभिनेता तक चल सकता है। और कुछ नहीं तो कुछ एंकर अल बगदादी को भी कई बार धूल चटा चुके हैं। ओसामा बिन लादेन तो मरने के बाद भी कई बार इन वीरों और वीरांगनाओं के आगे पानी भर चुका है। मुझे शक है कि पाकिस्तान तो बचा हुआ ही इसलिए है कि ये बहादुर बच्चे उसके साथ खेल सकें, जैसे शकुंतला पुत्र भरत शेर के बच्चों के साथ खेला करते थे। आखिर जिस देश का नाम उन्हीं भरत के नाम पर पड़ा हो, उसके टीवी एंकर भी चाशनी में उबलते गुलाब जामुनों की तरह सदा वीर रस में वैसे ही सराबोर क्यों न हों?

 

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