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महानता की स्पॉन्सरशिप का सरकारशास्त्र

शराबखाने में एक शराबी दूसरे से और पीने का आग्रह करते हुए कह रहा था- पी ले भई, थोड़ी और पी ले। तेरी ही वजह से किसानों के कर्ज माफ होने हैं। दोनों किसान राहत योजना के तहत पीने लगे। तमाम राज्य सरकारों ने किसानों के लिए कर्जमाफी की घोषणाएं की हैं। शराबी सरकारों को निराश नहीं करते। बढ़े हुए टैक्स से महंगी हुई शराब भी खरीदते हैं, पर मजाल है, कभी शराबियों ने इसका गुमान किया हो कि तमाम योजनाएं उनके ही बूते पूरी होती हैं। 
शराबी शराब-कर्म को आदर्श दान की तरह इतने चुपके से अंजाम देना चाहता है कि उसका बस चले, तो वह अपनी बीबी तक को पता न चलने दे कि क्या कर दिया। लेकिन शराबियों की यह गौरव-गाथा कहीं नहीं दर्ज होती। वैसे गौरव-गाथाओं का हाल अब यह हो लिया है कि वे सरकार बदलने के साथ बदल रही हैं। पहले परम महापुरुष कोई और थे, अब कोई और हो गए हैं। मुझे लगता है कि आनेवाले बरसों में किसी बच्चे से इतिहास के बारे में कुछ पूछा जाए, तो वह यह जवाब देगा- जी, इतने सन् से इतने सन् तक हमारे राज्य में महान यह थे, फिर वह महान हो गए। फिर गठबंधन सरकार आ गई, तो तीन विधायकों ने इस शर्त पर सरकार बनवाई कि न महाराणा  प्रताप महान माने जाएंगे, न अकबर महान माने जाएंगे, चोरड़िया मल ही महान घोषित होंगे, जिन्होंने इन तीनों विधायकों की फाइनेंसिंग की थी। महानता शेयर बाजार के सूचकांक सैंसेक्स की तरह होनी चाहिए। रोज बदले, रोज ही क्यों, हर मिनट बदले। 
संसाधनों के संकट से जूझती सरकारों को महानता की स्पॉन्सरशिप की बोली लगानी चाहिए। लो भई, जिसकी मरजी हो, खरीद लो। महानता तो हवाई कॉन्सेप्ट है, नोट असली ठोस होते हैं। उनसे किसानों के कर्ज माफ करके उसमें भी सचमुच का घोटाला किया जा सकता है। महाराणा प्रताप, अकबर की राजनीति में क्या रखा है? आइए, चोरडि़या मल के महान अर्थशास्त्र की तरफ चलें। 

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  • Web Title:nashtar hindustan column on 9 january