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पुष्पों के पीतांबर झूले

अहा, कितनी शुभ घड़ी है। शिवजी की बारात हर दरवज्जे खड़ी है। मौसम के हाथ पीले हो रहे हैं। विदा होती सर्दी के नयन गीले हो रहे हैं। संगम नहाते श्रद्धालुओं के बदन नीले हो रहे हैं। होली में देखना ये सब रंग हरे और बैंगनी हो जाएंगे। बाकी अगले चुनावों में तो सब काला होना ही है। जरा देखिए तो सही, जिसे और कुछ न सूझा, वह गले में पीला रूमाल बांधे बगीचों में घूम रहा है, ताकि सिर से पांव तक वह वसंती लगे। कल वसंत है। जगह-जगह होली की चीर भी गड़ जाएगी। अब तो बस बुआ का इंतजार रहेगा।
इस मधुमासी ऋतु का चूंकि कोई अंत नहीं, इसीलिए यह अनंत और दिग्दिगंत है। इधर ममता की हुंकार वसंती है, तो मोदी की मुस्कान वसंती। धरती तो धरती हुजूर, आसमान वसंती है। दिल्ली में तो चुनावी वसंत भंगड़ा नाच रहा है। हर नेता पर शेख-चिल्ली सवार है। गली-मोहल्लों में आशाओं और उम्मीदों की अपनी-अपनी कुतुब मीनार है। किसी पुराने छायावादी कवि के अनुसार, फूलों में नव यौवन छाया/ सखि वसंत आया।  इस पंक्तिका आधुनिक अर्थ यही है कि पुष्पों के पीतांबर झूले, जिसका भी मन चाहे झूले।
उधर कुछ विघ्न-संतोषी और असफल प्रेमियों का कहना है कि यह वसंत आ भी गया, तो हमारा क्या बिगाड़ लेगा? हम तो निरे मतदाता ठहरे, जो प्लास्टिक के फूलों में नकली इत्र छिड़ककर बौरा जाते हैं। उनका कहना है कि महंगाई के कारण हमारा चेहरा हमेशा पीला पड़ा रहता है, तो हम इस वसंत को धोएं या निचोड़ें? इस मादक मौसम में तो अनुचित काम करने का मन होता है। अच्छा-खासा भक्तिकाल रीतिकाल में बदल जाता है।
एक लेटेस्ट लंतरानी सुनिए- आज सुबह एक सखी ने खिड़की खोली और सामने देखते हुए दूसरी सखी से बोली, देख सखि वसंत आया। दूसरी सखी ने सामने देखा, पेड़ के नीचे पीला रूमाल बांधे मोहल्ले का एक मुस्टंडा खड़ा था। सौभाग्य से उसका नाम वसंत कुमार था। 
    

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column on 9 february