nashtar hindustan column on 9 april - चुनावी कारवां गुजरने के गुबार DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

चुनावी कारवां गुजरने के गुबार

गरमी ने चुपके से आकर सीलिंग फैन का स्विच ऑन कर दिया है। पंखे पर जमी हुई धूल उड़कर नेताजी की गाड़ी के पीछे उड़ रही धूल में जा मिली। चुनावी धूल में मिलना या तो धूल चटाना है या फिर जीत के फूल खिलाना है। नेताओं की गाड़ी के पीछे उड़ती धूल बहुत मायने रखती है। उड़ती हुई धूल को देखकर एग्जिट पोल वाले नतीजे बता देते हैं। फलाना नेता आगे चल रहा है या ढिकाना। झोंपड़ी में बैठा वोटर दूर से ही पता लगा लेता है कि फलाने नेताजी गांव में पधार रहे हैं। 
सच पूछिए, तो उड़ती हुई धूल से नेताजी ही नहीं, वोटर तक की पहचान हो जाती है। बस पहचानने वाला चाहिए। जो मतदाता धूल उड़ाती गाड़ी को आते देखते ही एक तरफ  साइड हो लेता है, संभवत: वह नेताजी का वोटर नहीं होता है। और जो गाड़ी के एकदम सामने आ जाने पर भी साइड में नहीं होता है, तो समझिए वह नेताजीजी का पक्का वोटर है। अपने बच्चों के चेहरों पर जमी धूल देखकर मां समझ जाती है कि बच्चे लुका-छिपी खेलने नहीं,बल्कि नेताजी के प्रचार के परचे लूटने गए थे। भले ही बच्चों को मतदान करने का अधिकार नहीं है, मगर वे यह अच्छी तरह जानते हैं कि वोट की कीमत क्या होती है। इसलिए कई बच्चे तो वोट डालने से पहले अपने घरवालों को यह बात अच्छी तरह से समझाकर भेजते हैं कि ईवीएम का बटन किस तरह से दबाना है। 
धूल उड़ाती हुई गाड़ियों का काफिला जब रास्ते से गुजरता है, तो उस रास्ते पर विकास की गाड़ी चढ़ी भी है या नहीं, यह बिना पूछताछ के ही मालूम हो जाता है। जब गाड़ी के टायर गड्ढों को बचाने के बावजूद गड्ढों में पड़ते हैं, तब गाड़ी ही बता देती है कि इस रास्ते पर तो विकास की गाड़ी क्या, विकास की साइकिल भी नहीं चली। गाड़ी में बैठे नेताजी जब पीछे देखते हैं, तो उड़ती धूल में भले ही काफिले की गाड़ियां न दिखें, कार्यकर्ताओं का जोश साफ-साफ दिखाई देता है। उनके द्वारा लगाए जा रहे जिंदाबाद के नारे उन्हें लगातार आश्वस्त करते रहते हैं।
    

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:nashtar hindustan column on 9 april