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धुआं-धुआं से खतरों का प्रदूषण

दिल्ली एनसीआर में प्रदूषण महाभयानक स्तर पर पहुंच गया है। यह बात किसी टीवी कार्यक्रम के शीर्षक की तरह लग सकती है, जहां संगीत की प्रतियोगिता या सास बहू सीरियल में दो महिलाओं की लड़ाई को महासंग्राम, महामुकाबला और महायुद्ध वगैरह कहा जाता है। लेकिन दिल्ली में आमतौर पर प्रदूषण भयानक स्तर पर रहता है, तो उससे भी बुरा होने पर महाभयानक ही कहना पड़ेगा। इससे भी ज्यादा खराब होने पर क्या कहा जाएगा, यह भाषाविद या टीवी वाले बता सकते हैं? 

दिलचस्प यह है कि सड़क पर अपनी कार से किसी दूसरे की कार छू जाने के शक भर से मरने-मारने पर उतारू हो जाने वाले दिल्लीवाले इस खतरे से बिल्कुल नहीं डरे हैं। वे तो पटाखों पर नियंत्रण के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश को कोस रहे हैं। हम सिर्फ काल्पनिक खतरे से डरते हैं, और उनसे लड़ने के लिए जी जान से जुट जाते हैं, वास्तविक खतरों से हमें कतई डर नहीं लगता। 

आजकल हमारा देश इस खतरे से जूझ रहा है कि धर्म पर गंभीर संकट आ पड़ा है और अगर हमने इस संकट का मुकाबला नहीं किया, तो धर्म नष्ट हो जाएगा। कहीं किसी मंदिर में महिलाओं का प्रवेश रोकने के लिए रणबांकुरे डटे हुए हैं, तो कहीं मंदिर बनाने के लिए लोग ललकार दे रहे हैं। उन्हें इस बात की फिक्र नहीं है कि प्रदूषण और कुपोषण से जूझते हुए इस देश में कल मंदिर में शंख बजाने के लिए बाहर से लोग लाने पड़ेंगे, क्योंकि यहां न किसी के फेफड़ों में, न आंतों में इतनी ताकत होगी कि शंख फूंक सके। 

ऐसे में सिगरेट छोड़ने के विज्ञापन देखकर हंसी आती है। खबरों में बताया जा रहा है कि हर व्यक्ति के फेफड़ों में 22-25 या 40 सिगरेटों जितना धुआं रोज जा रहा है। लेकिन कोई चेतावनी नहीं दे रहा है कि प्रदूषण रोकने की ठोस कोशिश न करने वाली सरकारें और लापरवाह नागरिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। 

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  • Web Title:Nashtar hindustan column on 8th November