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पहचान के संकट का घटाटोप  

मेरे शहर में घना कोहरा छाया है। इससे पहले कि मुल्क में चुनावी आचार संहिता लागू हो, इसे उतरती ठंडक और मधुमास की किताबी आमद का दमदार टोटका माना जा सकता है। यह खालिस मौसमी मामला है, किसी की व्यक्तिगत आलोचना यकीनन नहीं। आम आदमी को अमूमन यह अधिकार भी नहीं कि किसी की खुलेआम निंदा करे, अलबत्ता पीठ पीछे गुपचुप-गुपचुप चाहे जो करता रहे। इस नि:शब्द कोसने को राजनीति में सरोकार और साहित्य में व्यंग्य कहा जाता है।
पिछले दिनों मुल्क के पूर्वी हिस्से में वहां की सरकार धरने पर थी। वहां कोई धुंध नहीं है। मामला शफ्फाक है।  जिनके पास वहां खुद जाकर बैठने-उठने की फुरसत नहीं थी, उन्होंने अपना पुरजोर समर्थन विविध संचार माध्यमों से वहां भिजवाए। अब जंतर-मंतर वालों से अधिक धरने की टेक्नोलॉजी को भला कौन जानता है? बंगभूमि के पास लड़ने-भिड़ने का समयसिद्ध ब्लैक मैजिक है। वह धरने की धारणा से अधिक आग्नेय बयानों में यकीन रखती है। 
मौसम विज्ञानी बता रहे हैं कि आने वाले दिन में दिल्ली सहित उत्तर भारत के अधिकांश इलाकों में ओलावृष्टि हो सकती है। तब यह देखना दिलचस्प होगा कि कौन-कौन समय रहते सिर पर हेलमेट धर खुद को बचा ले जाता है। ग्रीष्म ऋतु के आते-आते राजनीतिक विक्षोभ के पारखी तय कर लेंगे कि उन्हें किस वैचारिक छतरी के नीचे खड़े हो वातानुकूलित सत्ताधारिता का लुत्फ लेना है?
पिछले काफी समय से चोर-सिपाही का देशव्यापी उत्सव चल रहा है। चहुंओर इतनी अधिक शाब्दिक धर-पकड़ मची है कि समझ में ही नहीं आ रहा कि चोर कौन है और सिपाही साहबों की असल शिनाख्त क्या है? कहने वाले तो कह रहे हैं कि यह पहचान के संकट का घटाटोप है। मौसमी के लिहाज से मुल्क में यत्र-तत्र शीतलहर चलती लग रही है। खबरची दुनिया में विविध प्रकार के धुआंते अलाव सुलग उठे हैं। 
    

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column on 8 february