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राजनीति पर जा सर्जी की हिंदी बंदी

 

 


हिंदी साहित्य में एक विवाद बरसों पहले चलता था, रूप और कथ्य का। प्रगतिशील लोग कहते थे कि कथ्य महत्वपूर्ण है और रूप पर जोर देना प्रतिक्रियावाद व पूंजीवाद का षड्यंत्र है। मैं काफी साल से हिंदी साहित्य की ओर नहीं गया हूं, इसलिए लेटेस्ट स्थिति मुझे मालूम नहीं। आखिरी बार जब मैं हिंदी साहित्य की ओर गया था, तब वहां यही चल रहा था और मुझे बताया गया कि इसके निकट भविष्य में बदलने की संभावना नहीं है। इसमें फायदा यह है कि हर साहित्यकार उस दूसरे साहित्यकार को रूपवादी कह सकता है, जिससे उसका झगड़ा होता है। रूपवादी से बेहतर गाली हिंदी साहित्य में ईजाद नहीं हुई है। चाहे झगड़ा पुरस्कार को लेकर हो या प्रेम संबंधों को लेकर, लेखक एक-दूसरे को रूपवादी कह देते हैं।
अब मुझे लगने लगा है कि रूप और कथ्य का झगड़ा सिर्फ साहित्य में नहीं है, यह जीवन के तमाम क्षेत्रों में प्रासंगिक है, इसलिए हिंदी साहित्य वाले अगर उसे थामे हुए हैं, तो कोई गलत बात नहीं। जैसे, राजनीति में आजकल फिर से भ्रष्टाचार विरोधी माहौल है। हर पार्टी और हर नेता भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपने-अपने स्तर पर सक्रिय है। जैसे लेखक दूसरे को रूपवादी कहते हैं, वैसे एक राजनेता दूसरे को भ्रष्ट कहता है। किसी के भ्रष्टाचार विरोध का रूप सीबीआई के आकार का होता है, तो किसी का संसद में शोर के प्रकार का। खास बात यह है कि सब रूप ही रूप है, कथ्य कहीं नहीं है।
यह सब कहने का प्रसंग है अन्ना हजारे, जो अभी-अभी एक और अनशन कर चुके हैं। वह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के सच्चे कलाकार हैं, इसीलिए हर सच्चे कलाकार की तरह उनकी भी पूछ नहीं हो रही है। अनशन उनकी कला का रूप है, जिसे वह हर बार पेश करते हैं, और जिसका कथ्य कब का गायब हो चुका है। जब खुद प्रधानमंत्री मोदी अपना भ्रष्टाचार विरोध लेकर मंच पर हों, तो बेचारे अन्ना को कौन पूछेगा?

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column on 7 february