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निगोड़ी उम्मीद के पांव हमेशा भारी

आपकी तो मैं नहीं जानता, लेकिन नया साल मेरे लिए बहुत शुभ निकला। नया साल लगते ही मैंने पहली मूंगफली तोड़ी, तो उसमें से बादाम निकला। दूसरी तोड़ी, तो उसमें से काजू निकल आया। तीसरी जान-बूझकर नहीं तोड़ी। कहीं अखरोट निकल आया तो? इतना लालच ठीक नहीं। क्या पता अप्रैल-मई में चुनावी मूंगफली से सड़ा दाना निकले, न निकले। वैसे गया साल कुछ गैर-मुनासिब नहीं कर गया। पांव भले ही अंगद का हो, जूता तो काटता ही है। अभागों को भले दिन ज्यादा रास नहीं आते। बहरहाल, उम्मीदों के बिना हमारे पास है ही क्या? 
अब हुजूर, कौन बहुरिया उम्मीद से नहीं होती? ज्यादा उम्मीद से हो, तो जुड़वां हो जाते हैं। अब पानी के सारे स्रोत सुखा देने वाले घमंडी सूरज से क्या यह उम्मीद की जा सकती है कि वह मजदूर के माथे का पसीना सुखा सके? सरकार भी लगभग ऐसा ही सूरज होती है। शादी से पहले प्रेमी अपनी प्रेमिका के लिए चांद-तारे तोड़ने की बात करता है, मगर शादी के बाद अमरूद तक नहीं तोड़ पाता। वैसे भी गरीबों का क्या नया साल, क्या गया साल? पराई प्रेमिका से भला क्या उम्मीद लगानी? हमारी तरह दुखी एक महिला को सांत्वना देते हुए एक संत ने कहा- दुखी मत हो बहन, जाओ किसी ऐसे घर से भिक्षा लेकर आओ, जहां अब तक कोई न मरा हो। महिला गई और घंटे भर बाद विधवा पेंशन लेकर लौटी। उसका संकल्प है कि वह इसी सरकार को वोट देगी। 
किसी के लिए नया साल ग्रहण की तरह लगा, किसी के लिए कफ्र्यू की तरह। सबको पता है कि जो देश को बड़े कायदे से खाते हैं, उनके पेट में कभी कीड़े नहीं पड़ते। देश की जड़ों में मट्ठा डालने के लिए सिर में चुटिया का होना जरूरी नहीं होता। बहरहाल, दो-तीन महीने आप पहले वाले मौज में रहें। उम्मीदों को व्यसनों की तरह पालते-पोसते रहें। गरीब के कटोरे में खोटे सिक्के तो उम्मीदों की तरह बजते ही रहते हैं।  
    

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column on 5 january