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9 अगस्त, 2020|2:58|IST

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उड़ जाएगा हंस अकेला

ज्ञानी जन भारत को अहिंसक देश बताते हैं। बुद्ध, महावीर और गांधी जैसी विभूतियों के कारण। क्या उनके चेलों ने उनकी सीख पर अमल किया है? कभी-कभी लगता है कि आदमी कई मायनों में पशु से बदतर है। पशु तो भूख लगने पर शिकार करता है, इंसान का भरोसा नहीं कि कब किसी की यूं ही हत्या कर दे। इस दो पैरों को जानवर को सामने सम्मान और पीठ पीछे उसी माननीय को गरियाने में महारत है। इनके चेहरे पर शिकन तक नहीं आती, जब ये भ्रष्ट खुद को कभी सदाचार का अवतार और कभी पांडवों का पर्याय घोषित करते हैं। इनके अंदर झूठ की ऐसी ‘चिप’ फिट है कि जुबान पर सच आने की गुंजाइश तक नहीं।
समृद्ध बस्ती के बाशिंदे इनसे कौन कम हैं? सब स्वघोषित दानवीर कर्ण हैं। सबका विश्वास गुप्तदान में है। हर सत्ताधारी दल पर इन्होंने काला धन लुटाकर अपना स्वार्थ साधा है। संपर्क और कर चोरी इनकी सफलता का जगजाहिर राज है। अफसर विवश हैं। वे समझते हैं कि चांदी का जूता खाना उनकी इज्जत-अफजाई ही नहीं, स्वस्थ रहने की अनिवार्यता भी है, वरना ईमानदारी के ताने सुन-सुनकर उनका जीवन कब का नरक बन जाता। अब वह दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से मुक्त हैं। ‘दैहिक’ के लिए कीमती डॉक्टर है, और ‘दैविक’की दवा हर बात में ओढ़ी हुई नैतिकता। जो जितना भ्रष्ट है, वह उसी अनुपात में ईमानदारी की बातें करता है। 
इन सबने अक्सर जाना-देखा है कि हर तनाव, चिंता, लोभ, लालच, ईष्र्या, मोह, महत्वाकांक्षा को पीछे छोड़ प्राणों का हंस या कौआ एक दिन अचानक उड़ जाता है। कई संत-महात्मा, दान पात्र सामने रखकर जीवन की नश्वरता और भौतिकता की अंधी दौड़ की मूर्खता पर हजारों की भीड़ के सम्मुख लच्छेदार प्रवचन के विशेषज्ञ हैं। क्या उन्हें सांसों की अनिश्चितता का भान नहीं है? अवश्य होगा, किंतु तब तक यह और अन्य महापुरुष पर उपदेश कुशल  होने की प्रतिभा को कैश क्यों न करें?

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column on 26 march