nashtar hindustan column on 25 march - परिवर्तन के पक्षधर की प्रताड़ना DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

परिवर्तन के पक्षधर की प्रताड़ना

शर्माजी का सम्मानजनक संबोधन है सांसदजी। दीगर है कि वह पिछले आम चुनाव में भूपू (भूतपूर्व) हो चुके हैं। बहुत से लोगों के लिए प्रजातंत्र अतीत के ढांचे का पर्याय है। यह हाईकमान की सनक है कि सत्तू को प्रत्याशी बनाए या फिर नत्थू को। किसी भी संस्था को नियम-विरोधी आदेश दे। अवज्ञा पर संस्था को काटे-छांटे। मनमर्जी से बदलाव करे।
भूपू सांसद अभी तक इसी हाईकमान के भोंपू रहे हैं। जब से टिकट कटा है, वह ‘पानी में मीन पियासी’ की ऊहापोह में हैं। यूं कहने को तो उनकी मुखर चिंता जनता को लेकर है। उसका क्या होगा? उनके जैसा सक्षम सेवक किसी और का होना संभव है क्या? ऐसे उनको देखते ही पान के लतियल पिच्च से पीक करते हैं और दूसरों को तत्काल थूकने की याद आती है। साथ के चमचे, नेता को सूचित करते हैं- ‘सर, आपने गौर किया कि नहीं? सब अपना मुंह साफ कर रहे हैं कि आपसे वार्तालाप कर सकें।’ इसी को कुछ मुक्कालात करने की आतुरता भी कहते हैं।
भूपू को अपनी इसी लोकप्रियता पर नाज है। इसी मुगालते में वह सुबह से नहा-धोकर घर के मंदिर उर्फ दफ्तर में आ बिराजते हैं भक्तों को दर्शन देने। जब सांसद थे, तब भीड़ उमड़ती थी, स्वार्थ सिद्धि के लिए। अब कोई झांकता तक नहीं। वह तो पिट्ठुओं का मौखिक प्रचार है देवता के प्रसाद को लेकर। मुफ्तखोरी भारत की खासियत है। कोई-कोई तो मंच पर जूते कैच करके खुश है, जोड़ी मिलाने की जुगाड़ में। फिर प्रसाद तो प्रसाद है। फ्री की चाय तो देव-दर्शन का आकर्षण है। शर्माजी का प्रवचन है कि दलों की दलदल में क्या धरा है? प्रगति में मौसमी परिवर्तन अपरिहार्य है, तो इंसानों में क्यों नहीं? उसूलों की बात फिजूल है। दलों का एकमात्र सिद्धांत सत्ता हैै। कोई इसे झूठ से पाता है, कोई पारिवारिक उपलब्धियों की डींगे हांककर। इसीलिए शर्माजी इधर टिकट के भिक्षा पात्र के साकार अवतार बने, हर दल का दरवाजा खटखटा रहे हैं।  
    

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:nashtar hindustan column on 25 march