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अंतकाल पछताएगा आदि-इत्यादि

हमारे यहां एक मुहावरा है कि- अंतकाल पछताएगा, लूट सके तो लूट। इसमें चेतावनी दी गई है कि- हे मूरख। अंतकाल की प्रतीक्षा मत कर। जीवित रहते जो लूटना है, लूट ले। इससे पहले कि चिड़ियां चुग जाएं। तू पूरा खेत ही लूट ले। चिड़ियों को पछताने दे। जो लोग सक्षम होते हैं, वो इज्जत तक लूट लेते हैं। अभागे तो पतंग तक नहीं लूट पाते। लूट में तो कला भी है और कौशल भी। जैसे महंगाई भी है, तो महंगाई भत्ता भी। मैंने पहले भी कहा है कि लूटमार करने वाला सुल्ताना डाकू अगर जीवित होता, तो आज राजनीति में होता। 
लूटना तो कर्ता भी है और कर्म भी। मुर्दे को मृत्यु का भय नहीं होता। लूट तो एक महत्वाकांक्षा का नाम है। यह साध्य का साधन है। आज के जमाने में इसके लिए राजनीति में शामिल होना पड़ता है या फिर सरकारी नौकरी करनी पड़ती है। इसका अपना प्राइवेट क्षेत्र भी है। ठेकेदारी, दलाली, घूस, कमीशन तो इसके पर्यायवाची नाम हैं। ऐसे ही कोई दाऊद इब्राहिम नहीं बन जाता। गले की चेन लूटना तो लूट की प्रारंभिक अवस्था है और बैंक लूटना इसकी परिणति। लूटने का काम संभ्रांत अपराध की श्रेणी में आता है। यहां दोषारोपण की संभावना ज्यादा होती है। पतंग हमेशा सोचती है कि बिजली के तारों में कटने-फटने से तो अच्छा है कि कोई उसे लूट ही ले। मगर चर्खी पकड़ने वाले अक्सर पतंग नहीं लूट पाते। 
लुट जाना तो लोकतंत्रीय त्याग है। बलिदान है। लंका लूटने के लिए ही हनुमानजी ने अपनी पूंछ में आग लगवाई थी। लूट में एक गोपनीयता भी होती है। 
कुछ साल पहले एक फिल्मी हिरोइन आई थी। यूपी-बिहार लूटने। तमाम नाच-गाने के बावजूद वह लूट नहीं पाई। इसलिए कि अब लूटने का ठेका राजनीतिक दलों ने ले लिया है। सब कुछ लुटा के होश में आने के बाद यही लालसा रहती है कि- हाय अब फिर कब लुटेंगे? लूट सके तो लूट वरना फूट। 

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column on 24 march