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कैसे-कैसे मंजर सामने आने लगे हैं

पता नहीं यह चुनावी वातावरण का असर है या घटनाओं का परिणाम कि इकबाल साहब के आकलन पर प्रश्नचिह्नों के जाले लटक रहे हैं। जिज्ञासा फड़फड़ा रही है कि हमारा हिन्दुस्तान कभी ‘सारे जहां से अच्छा’ था भी, या यूं ही लंतरानी बोल गए शायर साब। किसी कंठ से बुलबुल जैसी कोमल ध्वनि नहीं सुनाई पड़ती। चतुर्दिक कांव-कांव। हर शख्स किसी न किसी को गरिया रहा है। 48 से 72 घंटे ‘बावरी जुबान’ को ‘खामोश’ करने से हल नहीं होना। गमन  फिल्म में बम्बई महानगर की टीस को जनाब मुजफ्फर अली ने दर्शाया था। अब तो छोटे से कस्बे में हर शख्स परेशान है। जलन सीने में नहीं, दिमाग में धंसी कि अगले को कैसे पटखनी दी जाए? 
किसी को पहचानना किसी के वश में नहीं। दस-बीस आदमी तो निदा फाजली साहब का विनम्र आकलन था, एक चेहरे में कई चेहरे छिपा लेते हैं लोग। अपने बड़प्पन और एको अहम् द्वितीयो नास्ति  का भूत हर आदमी के सिर पर सवार। वह आधा मित्र है, आधा शत्रु। एक ही चीज एक सिरे से सही, तो दूसरे छोर पर गलत। मन मयूर भी अब सामयिक नहीं रहे। ऐन पूर्णिमा के दिन ‘अमावसी’ हो जाते हैं। पंचांग देखकर भी व्यवस्थित रूप से खुशी नहीं मनाई जाती। तीज-त्योहार मनाना सामाजिक विवशता। कभी ललित पर्वों पर झूमने वाला मन अब दलित समस्या के मायावी जाल में उलझा हुआ है। रक्षित-आरक्षित, ललित-दलित सभी अपने आप में राष्ट्रीयकृत (वोट) बैंक। जिसे देखिए छल कबड्डी आल-ताल, मेरी मूंछे लाल-लाल कर रहा है। आग और असलाह से भले अजर-अमर आत्मा महफूज रहे, अमानवीय ‘बक-तव्यों’ के नश्तर से दिन में न जाने कितनी बार आहत होती रहती है।
बी आर चोपड़ा साहब ने पिछली सदी में एक फिल्म बनाई थी कानून।  उसका एक  डॉयलाग था, खून करो और बचके दिखाओ।  यह एक जज साहब का कथन था। सिर्फ साहित्यकार ही भविष्य नहीं देखते, जिन्होंने कभी कहा, हम कौन थे, क्या हो गए और क्या होंगे अभी...।
    

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column on 19 april