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होश के नाखून बचा के रख

होली आते ही जिसका सब्र न टूटे, धीरज न छूटे और जो अपने खूंटे से न उखड़े, तो समझिए कि वह ऐसा उम्मीदवार है, जिसे टिकट मिलने की कोई उम्मीद नहीं। इन दिनों तो दबी हुई कामनाओं, इच्छाओं और उछाल मारते मनसूबों पर कोई पाबंदी काम नहीं आती। मैं पाकिस्तान की बात नहीं कर रहा। खैर, यह सब छोड़िए। मौसम पे आइए। खोटी नीयत और कमजर्फों की तरफ देखिए तो सही। बहुत अच्छे। क्या बात है। अभी पूरी गुझिया बनी नहीं कि लगे मीठा मैदा चाटने। अमां, अभी से?
अजी अभी तो दूर है होली। शरम की गांठ क्यों खोली? चढ़ा ली भांग की गोली। अभी से? यानी अभी शादी हुई नहीं और होटल की बुकिंग चालू। अजी आम बनने से पहले ही बौर चबा लोगे क्या? अरे लोमड़, अरे गीदड़, अबे लंपट, अबे लीचड़, अबे गोबर, अबे कीचड़। अभी से? शकल सूरत से है टंगा, शुरू क्यों कर दिया दंगा? खड़ा है बेशरम नंगा। अभी से? अभी तो बंद हें होटल। किया खर्चा जमा टोटल। क्यों तूने खोल ली बोतल? अभी से? अरे नाशुक्रे, अभी से बजाता ताली। पकड़ ली अभी से नाली। बहुत अच्छे। क्या बात है। अरे बत्तमीज होलिका दहन तो होने दे। अभी से? प्रह्लाद के साथ बैठकर पपलू मत खेल। अबे इतना बिफोर टाइम। अभी से अंटा चित्त मोहल्ला गायब क्यों कर रहा है? अभी रंग लगा नहीं कि तू लगा अपने कपड़े फाड़ने। इतने एडवांस में मुंह काला क्यों कर रहा है? पहले कुछ बेशर्मियां तो कर ले। अरे खूसट, गंजों के गांव में नाई का इंतजार तो कर ले। होश के नाखून बचा के रख। धुलेंडी के दिन मुंह नोचने के काम आएंगे। 
खैर, छंटे हुए नेताओं को होली मुबारक। पता नहीं, चुनावों के बाद वे अगली होली देखें या नहीं। बहरहाल, होली पर ड्यूटी कर रहे किसी चिड़चिड़े दारोगा से होली मत खेलिएगा। हो सकता है कि वह गाली की गोली दाग दे। आखिरी बात, जब घर में फूफा बौराने लगें, तो समझिए होली शुरू।  
    

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column on 16 march