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होली में काहे की आचार संहिता

सरजी नमस्कार, जान सकता हूं कि आप कौन बोल रहे हैं? मोबाइल बजने पर हरा बटन दबाते ही कान में गूंजा। 
बोल आप ही रहे हो जहांपनाह, बंदा तो सुन रहा है- फागुनी असर में मुंह से यही शब्द निकले। 
जोक्स अपार्ट। होली पर आप क्या जलाना चाहेंगे? 
सुन भइये, अंदर कुछ और बाहर कुछ सरीखी सियासी सूरतों को देख, पब्लिक ऑलरेडी जल रही है। क्या गारंटी कि जो जलाना चाहें, वह जल ही जाए? मामूली आदमी का चूल्हा ‘जलता’ रहे यही काफी है। 
दाल गलती न देख ‘क्या जलाना चाहेंगे’ वाली जिज्ञासु आत्मा ने ‘नाता’ तोड़ लिया। रंगों की होली साल में एक ही बार आती है, लेकिन बुरा न मानो होली है के अग्रिम विनय भाव के बावजूद हर किसी पे रंग नहीं डाला जा सकता। धार्मिक भावनाओं के आहत होने का खतरा है। नेताओं की छींटाकशी की भाषाई होली तो लगभग रोज होती रहती है। बाहुबलियों को बुरा न मानो कहने की दरकार ही क्या? लोकगीतों का भगवत प्रभाव धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है। सरौता कहां भूल आए प्यारे ननदोइया, उनकै फाटि गै सुथनिया  भूल गए नगरों में अब शोले वाली होली से लेकर अमिताभी कंठ में रंग बरसता है, बिना चुनरी वाली भीगती है। उधर प्रशासन की विज्ञप्तियां ऐसा हुल्लड़ न करें, जो पड़ोसी को पसंद न हो, हर्बल होली खेलें, हरे-भरे पेड़ न जलाएं, किसी पूजा के पहले बुदबुदाए जाने वाले मंत्रों की तरह होती हैं। बाद में सब स्वाहा...। सूचनाओं का भय मजा किरकिरा कर देता है उस त्योहार का, जिसमें वनस्पति तक ‘बौराय’ जाते हैं। बाबा, जो देवर नहीं बन सकते, नियम-कानून बताने के चक्कर में जेठ ही नजर आते हैं। मतभेद, मनभेद तज गले लगने वाले पर्व पर, जिसमें ‘बुरा न मानो’ की अग्रिम क्षमा-याचना के साथ ही समस्त हुड़दंग माफ हो जाता है, प्रभु भला करें मीडिया शिरोमणियों का, जो होली पर भी जलते-भुनते हुए जलने-जलाने की सोचते हैं।  

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column on 15 march