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एक स्वच्छता अभियान ऐसा भी चलाया जाए

कमाल है, आजकल यहां कोई डरता ही नहीं। पहले के लोग अपने पैर भी बढ़ाते थे, तो डर-डरकर। जैसे डरना अनिवार्य हो। डर जब हमको जीतना सिखाता है, तब हम सचमुच डरना भूल जाते हैं। एक बात यह भी कचोटती है कि हमको डरने की शिक्षा दी जाती है। 
आज कोई बंदूक की नली भी गर्दन पर रख दे, तब भी इंसान भीगी बिल्ली बनकर नहीं भागता, बल्कि वहीं से आगे बढ़ने की नई उड़ान भरता है। हर रीत-रिवाज, परंपरा, नियम-कानून, सिद्धांत और समाज से डरना तो दूर, वह सपने तक डरने के नहीं देखता। सिगरेट बड़ों को देखकर पैंट की जेबें जला देती थीं, तो हम क्या करें? हमें तो हर पैग में डर को घोलकर पी जाने की आदत है। कोई डरकर, जीवन से हारकर बिल्डिंग से छलांग मारता फिरे, यह उसकी अपनी दिक्कत है, हमें तो जमीं पे कदम रखकर बेखौफ चलने की आदत है। 
डरने का अर्थ शिष्टाचार होता था कभी। आज अर्थ बदल गया। डरने का अर्थ आंखों में आंखें डालकर असभ्यता से बातें करना हो गया। जब इंसान ने डरना छोड़ दिया, तो सरकार भला क्यों डरे? राजनीतिक इतिहास में कभी भी न ही पक्ष डरा, न ही विपक्ष। जनता महंगाई और भ्रष्टाचार से डरी भी, तो हमारी सरकारें अपने संबोधनों से उसके डर को काफूर करती गईं। लेकिन यहां तो अब कोई डरता ही नहीं। सब के सब खौफ पैदा करने का प्रमाण  लिए घूम रहे हैं।
इसलिए अब जरूरी है कि हर जगह स्वच्छता अभियान की तरह डर को भी साफ करने का अभियान शुरू हो जाए। बडे़ तो बड़े बच्चे भी डर के आगे घुटने नहीं टेक रहे। बच्चों को अंधेरों से डरने की शिक्षा दी जाती है। बच्चे खुद को अंधेरी रातों में सुनसान राहों पर हर जुल्म मिटाने को एक मसीहा निकलता है, जिसे लोग शहनशाह कहते हैं के भाव को अपने अंदर जगा रहे हैं। और डर की हमारी प्राचीन व अति विकसित परंपरा को खत्म कर रहे हैं।   
    
 

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column on 12 january