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पिया मिलन की आस वाली अंखियां

अभी समर शेष है। गांडीव अब भी गनगना रहे हैं। गदा प्रहार जारी है। जुबानी गोले दग रहे हैं। मसान तक में सन्नाटा नहीं है। मंच के भीतर लठमारी मची है। आखिरी परदा खुलने में कुछ देर है और दर्शक वोट देने वाली उंगली थामे दम साधे बैठे हैं। सबकी अपनी-अपनी अयोध्या है और सब अपने विरोधियों को दशानन बता रहे हैं। निर्वाचन क्षेत्रों की अयोध्याओं में स्वागत के शामियाने तने हैं। सिवा किन्नरों के सब नाच रहे हैं। कोयलें आदेश पर मंगल-गीत गा रही हैं। मगर ये सब जिस के लिए हो रहा है, वही लापता है। अभी तो परदे में रहने दो परदा न उठाओ  वाली कव्वाली चल रही है। 
कुछ उम्मीद भरे तो चमड़े की तरह अकड़ने लगे हैं। कुछ ही दिनों के बाद ये राजनीतिक कैदी इंतजार की जेलें तोड़कर फरार हो जाएंगे। जीत जाने के बाद पांच साल तक फरार हो जाने का रिवाज तो है ही। अभी हाल यह है कि वनवास हो गया, पर दशरथ के प्राण नहीं निकल रहे। अर्जुन निशाना साधे खड़ा है, मगर न पेड़ है, न चिड़िया। गदाएं कंधे पर भारी हो रही हैं। मुर्दों को क्या मारना! जीतने वाले वादों का दान दें, न दें, हमारा फटा दामन फैला ही हुआ है। 
किसी लोक गायिका ने कभी कौए से विनती की थी कि- कागा सब तन खाइयो, चुन चुन खइयो मांस, दो नैना मत खइयो, इनमें पिया मिलन की आस।  दयालु कागा मान गया। कौए की छोड़ी वही दो आंखें हैं, जो 23 मई को पिया मिलन के लिए तरस रही हैं। पिया कौन होगा, इससे कोई मतलब नहीं। दुल्हनों को दूल्हे से ज्यादा सुहाग से मतलब। अभी तो आधा शृंगार है और आधा विलाप। जाने कब किसकी जरूरत पड़ जाए। 
सब जानते हैं, जो जीतेगा, वह भाग जाएगा। जो हारेगा, वह मारेगा। सही भी है, कहीं शहनाई बजती है, कहीं मातम भी होते हैं। बहरहाल, अब सब कुछ लबेबाम है। बस हमारी कमंद नहीं टूटनी चाहिए। सबको जिस तारीख का इंतजार है, उसमें लगभग दो हफ्ते बचे हैं। कैलेंडर देखते रहिए। कौए ने दो आंखें इसीलिए तो छोड़ी हैं। 

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column on 11 may