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हाथ-हाथ तेरे कितने काम

जब से खबरिया चैनल आने वाले चुनाव के बचे दिनों की संख्या टीवी स्क्रीन पर सजाने लगे हैं, तभी से विचारों के यातायात में प्रतिदिन ट्रैफिक जाम न जाने क्यों इस बात पर हो रहा कि चुनाव की बेला में ही सिर्फ हाथ मजबूत करने पर काहे जोर दिया जाता है। बाकी अंग हाशिये पर? यद्यपि ‘चरण-वंदना’ में ‘पाद-पंकजम’ से सुशोभित किया गया है विघ्नेश्वर को और अचर्चित रह जाते हैं हाथ। तथापि काफी ताकतवर स्थिति होती है हाथ की। जितने आख्यान इनकी भूमिका के हैं, अन्य अंगों के नहीं हैं। शिष्टाचार में हाथ मिलाए जाते हैं। अभिवादन में हाथ हिलाए जाते हैं। मन-मुटाव की घड़ी में खींच भी लिए जाते हैं। नौबत हाथापाई तक आ जाती है। एक तरफ पैसे को हाथ की मैल कहते हैं, दूसरी ओर हाथ की सफाई से सब कुछ उड़न छू। वैसे हाथ की सभी अंगुलिया बराबर नहीं होतीं, लेकिन जहां (माल) खाने की नौबत आई, वे ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ हो जाती हैं। 
हाथ मजबूत और कान का कच्चा होना आम बात है। होने को तो सिर से पैर तक सभी अंग मजबूत रहने चाहिए। पैरों में भी यदि मजबूती होती, तो कड़े कदम उठाए जाएंगे, सतह पर न आता। लात मारने से बंद दरवाजे तक खुल जाते हैं। बावजूद इसके कि कानून के हाथ लंबे बताए जाते हैं, दुर्जनों को सजा मिलने में सालों लग जाते हैं। लेकिन हर चुनाव में सभी दल दिमाग की बजाय हाथ मजबूत करने की याचना करते हैं। सिने-जगत के अमर डाकू जी बदले की भावना में चाहते, तो टांग तोड़ लंगड़ा भी बना सकते थे। मगर वह हाथ की वैल्यू समझते थे, तभी क्रूर विनय भाव में याचना की कि ‘ये हाथ हमें दे दे ठाकुर’। 
वोट डालने के बाद अगले चुनाव तक ‘हाथ पे हाथ रखकर बैठना’ ही वोटर की नियति होती है। और हां, इन मुट्ठी भर तथ्यों से दल विशेष के चुनाव-चिह्न की महिमा अभीष्ट नहीं, जो गुजरे चुनाव में ‘हाथ’ मजबूत होते ही दुख भरे दिन बीते रे भैया के जोश में फुदक रहे हैं। 

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column on 11 january