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9 अगस्त, 2020|11:03|IST

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हम भगतिन के भगत हमारे

अभी होली की खुमारी गई नहीं। कनपटियां अभी तक गुलाबी हैं। नाखूनों में रंग जमा है। खुमारी उतारने के लिए थोड़ी-बहुत लेते रहना चाहिए। होली के दिन जिन लोगों ने गोबर और कीचड़ को उबटन की तरह इस्तेमाल किया था, उनका डैंड्रफ खत्म हो गया है, और त्वचा चमकीली हो गई है। खैर होली तो बुआ-भतीजे की कथा का त्योहार है। होली में अपनी बुआ की गोद में बैठकर प्रह्लाद सकुशल लौट आया था। 

उधर चुनावी त्रिपुरा में लाल रंग की नहीं चली। सब कुछ केसरिया हो गया। वैसे भी राजनीति में अकेले पाप नहीं किया जाता। पाप लगता है। आपने देखा नहीं, दफ्तर का बाबू अकेले रिश्वत नहीं लेता, अपने बॉस को भी कॉन्फिडेंस में लेता है, तभी रिश्वत के धन में बरकत आती है। अकेला चोर तो टुच्चा होता है। डकैत नहीं बन पाता। जो घरानेदार चोर होते हैं, वे बैंक लूटते हैं और विदेश भाग जाते हैं। उनका काला धन हमेशा सिलेटी रंग का होता है। सच तो यह है कि पुलिस वालों का अत्याचार उनकी ड्यूटी है, कर्तव्य है, अधिकार है। बल्कि आजकल तो वह धर्म हो गया है।
जहां-जहां होली खेली गई थी, वहां की प्रकृति नहा-धोकर चंचल पतुरिया सी लग रही है। चारों तरफ मूर्खता के बीज बोए जा रहे हैं, ताकि अच्छे अप्रैल फूल खिल सकें। अगले महीने मूर्खताएं रिन्यू होती हैं। वैसे भी निराधार नहीं होतीं। आधार कार्ड तो चाहिए ही। अगर सरकार की कृपा हो जाए, तो सूखा पड़ना निश्चित है। मठ उजाड़ने के लिए तो एक ही जोगन काफी होती है हुजूर। राजनीतिक होली का तो यही निष्कर्ष निकला कि- सार सार को गहि रहे शेष रहा अवशिष्ट। हाथ जोड़ बिनती करें केरल के कम्युनिस्ट। 

मौसम तपने लगा है। अमियां सिर उठाने लगी हैं। कोयलों ने म्यूजिक कॉलेज ज्वॉइन कर लिया है। नवोदित संत खुश हैं। वे जेल में हों या बेल में, यही भजन गा रहे हैं कि- हम भगतिन के भगत हमारे। यह गति टारत न टारे।

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column on 10 march