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बदलते वक्त के रिसते रिश्ते

अफवाहों के औरंगजेब पान की दुकान, सरकार के दफ्तर और शहर के हर गली-कूंचे का शृंगार हैं। ऐसों के स्थानीय प्रतिनिधि ने कल हमें सूचित किया कि ‘बड़ी दुर्दशा है। पश्चिमी प्रभाव से भारतीय परिवारों में संत्रास का दौर है कि बेटा मां-बाप को मां-बाप नहीं मानता और भाई-भाई को।’ हमने उनसे बस यह पूछा कि ऐसा क्या हो गया, तो जैसे सत्य और अर्द्धसत्य का बांध खुल गया। ‘वह जो वर्माजी हैं, बेटे-बहू ने उनको उन्हीं के घर से निकाल दिया है। बेचारे सड़क की शरण में हैं।’ हमने दफ्तर जाते वक्त मोहल्ले की हर सड़क पर तलाशा, पर कूड़े के ढेरों में कुत्तों, सूअरों और गाय-भैंसों के सिवा कुछ नजर न आया।

हम रास्ते भर सोचते रहे कि हर सामाजिक विकृति का ठीकरा पश्चिम पर फोड़ना कहां तक उचित है? दहेज की कुरीति क्या आयातित है? संयुक्त परिवार के बिखराव के कारण आर्थिक हैं या पश्चिम-जनित? आज पापी पेट की विवशता है, घर छोड़कर बाहर जाने की। विभिन्न शहरों में सगे भाई बसे हैं, माता-पिता कहीं और, तो फिर कैसे बचे संयुक्त परिवार? भारत में रिश्तों की भरमार है। मेल-मुलाकात के अभाव में इनका अस्तित्व केवल शब्दकोश में पाया जाता है। शादी-ब्याह, अंत्येेष्टि आदि में टकराए, तब औपचारिक परिचय होता है, वरना सब अजनबी हैं। यदि कोई बड़े पद पर स्थापित है, तो मसला दीगर है। 

कुछ का निष्कर्ष है कि वर्तमान युग में संबंध सिर्फ उपयोगिता पर निर्भर हैं। जिन बूढ़ों ने खून-पसीना एक कर पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया, अब वे मां-बाप क्या दे सकते हैं? आज वे सिर्फ सेवा, इलाज और अस्पताल के खर्चे के पर्याय हैं। रिश्ते सिर्फ औपचारिकता के वास्ते शेष हैं, पर वे उतने ही खोखले हैं, जितने असहाय जनता को दिए गए नेता के चुनावी आश्वासन। संबंधों के दर्शनीय रीते पात्र समाज में घर-घर मौजूद हैं। पर उनमें स्नेह की बूंद भर भी खोज पाना एक नायाब उपलब्धि है। स्नेह ऐसी चीज नहीं, जिसे पैसे देकर खरीदा जा सके।    

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column by Gopal Chaturvedi