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डर के कारोबार का जमा हुआ बाजार

मेरी उम्र अब उस पड़ाव पर पहुंच गई है, जहां मैं रेलवे का टिकट सीनियर सिटीजन वाले रियायती दामों पर खरीद सकता हूं। मैं जब बच्चा था, तब से यह बात कही जा रही थी कि देश में हिंदू खतरे में हैं। लेकिन उस उम्र में मेरे डर दूसरे होते थे। मसलन, स्कूल जाने का डर, होमवर्क न करने पर सजा मिलने का डर, परीक्षा में अच्छे अंक न ला पाने का डर, भूत का डर, आवारा कुत्तों का डर, लेकिन हिंदू होने के नाते खतरे में होने का डर मुझे कभी नहीं रहा। और मेरे बचपन के बाकी डर भी समय के साथ खत्म हो गए। लेकिन सबके साथ शायद ऐसा नहीं होता। समय खत्म हो जाता है, पर डर खत्म नहीं होता।
हैरानी यह है कि 60 साल से ज्यादा हो गए और अब भी बहुत सारे लोगों को वही डर सता रहा है। उस दौर के बहुत सारे लोग तो इस डर को लिए-लिए ही भगवान को प्यारे हो गए। हो सकता है कि उस लोक में भगवानजी उनके इस डर को दूर करने में कामयाब हो गए हों। वे लोग अपनी भावी पीढ़ियों के लिए यह डर छोड़ गए। अब उनकी भावी पीढ़ियां इस डर को जोर-शोर से फैला रही हैं। 
अब मुझे समझ में आ रहा है कि दरअसल यह डर मार्केटिंग का एक तरीका है। जैसे गोरेपन की क्रीम बेचने वाले काले होने का डर फैलाकर या मर्दानगी की दवा बेचने वाले नपुंसकता का डर दिखाकर अपना माल बेचते हैं, वैसे ही खतरे का डर कुछ लोगों के लिए अपना माल बेचने का तरीका है। यह माल कुछ भी हो सकता है। डर की मार्केटिंग का यह नुस्खा आज भी उतना ही कामयाब है, जितना 20-25, 50 या सौ साल पहले था। 
देश की 80 प्रतिशत आबादी को यह डर दिखाना कि उन्हें बीस प्रतिशत से खतरा है, काफी चतुराई और काफी कलाकारी भरा काम है। साथ ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह भ्रम बनाए रखना भी कोई आसान काम नहीं है। इससे पता चलता है कि यह मार्केटिंग करने वाले कितने अक्लमंद और हुनरमंद हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी इनके माल के खरीदार सचमुच कितने अल्पबुद्धि हैं।
    

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column 18 april