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एक तस्वीर खासो आम की है

इन दिनों आम की खूब चर्चा है। आम के मौसम में आम की बात न हो, तो अच्छा भी नहीं लगेगा। आम आम है और खास खास। आम सदैव से निरंतर आम है, परेशान है, जबकि खास महिमामंडित। हालांकि खास के लिए आम खास होता है, क्योंकि चुनावी जंग में आम होना ही उसे खास बनाता है। इसलिए आम चुनाव में आम आदमी के समक्ष नेताओं के पुरजोर नर्तन पर नोट उड़े। इधर आम आदमी मौसम बनाता रहा, उधर वोट डल गए। अब आम आदमी मौसम के भरोसे नहीं है।  
आम के बारे में सदैव से प्रश्न यह रहा कि आम लंगड़ा क्यों कहलाता है, जबकि आम बिना पैर वाला है? इसके दाम में इतना दम रहता है कि आम आदमी का दम निकल जाता है। यह लंगड़ा कम चुसनी ज्यादा प्रतीत होता है। यह आम से खास और सम्मानीय होकर आम के आम गुठलियों के दाम जैसी कहावत में जा बैठा है। पहले यह कहावत यदा-कदा चरितार्थ होती थी, लेकिन आज के दौर में यह आम हो गई लगती है। आम के आम गुठलियों के दाम जैसे दोहरे लाभ की संस्कृति आज चरम पर है। लाभ सर्वोच्च है। बिना लाभ कोई बात नहीं करता, बल्कि लोग दोहरे लाभ की बात हो, तभी घास डालते हैं। यह दोहरे लाभ की संस्कृति नई पीढ़ी में भी पनप रही है। रूठा नन्हा बालक एक नहीं, दो टॉफी लेकर मानता है। पुराना स्कूटर लाओ और नई कार ले जाओ जैसे दोहरे लाभ के लालच में पड़कर अनेक मध्यमवर्गीय कर्जदार बन बैठे हैं।
हालांकि संवेदनशील और ईमानदार व्यक्ति घूसखोरी से डरता है, लेकिन बात अगर मुफ्तखोरी की हो, तो थोड़ा-बहुत विचार किया जा सकता है। यही है दोहरे लाभ की संस्कृति- आम के आम और गुठलियों के दाम वाली बात। अब यह बात और है कि यह कहावत उन किसानों पर लागू नहीं होती, जो आम के बाग संभालते हैं। आम का व्यापार करने वाले खास लोगों के लिए जरूर यह आम हो गई लगती है। सच तो यह है तेरी गजल हमदम, एक तस्वीर खासो-आम की है।
    

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column 16 may