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वादे पे तेरे मारा गया

वादा करना प्रेमियों और राजनेताओं की प्रोफेशनल मजबूरी है। इनके वादे कई प्रकार के होते हैं। चांद-तारे तोड़कर लाने के लिजलिजे इमोशनल टाइप वादों से लेकर लॉन्ग ड्राइव पर ले जाने, ऑफलाइन-ऑनलाइन शॉपिंग करवाने जैसे रियलिस्टिक वादे प्रेमियों में खासे लोकप्रिय हैं। राजनीतिक हलकों में 15 ‘लखटकिया’ से लेकर 72 ‘हजारिया’ तक के वादों की चुनावभेदी मिसाइलें दागी जाती रही हैं। 
जानकार बताते हैं कि प्रेमियों के वादों का उद्गम स्थल उनका दिल होता है, जबकि नेताओं के वादों की फैक्टरी उनके दिमाग में स्थित होती है, जिसके प्रवेश द्वार पर ‘यह रास्ता आम नहीं है’ का बोर्ड टंगा रहता है। चुनावी मौसम में वादों का उत्पादन अपने चरम पर होता है, जिनकी घोषणा चुनावी स्थान और तापमान देखकर किश्तों में की जाती है। इन्हीं वादों में कुछ और वादे जोड़कर तैयार की गई पुस्तक को ही चुनावी घोषणापत्र कहते हैं। विरोधी दलों के घोषणापत्र को ढकोसला पत्र बताया जाना असलियत में चुनावी शिष्टाचार का ही एक अंग है। भोली-भाली पब्लिक भले ही यह गा-गाकर अपना दिल बहलाती रहे- ये जो पब्लिक है सब जानती है, लेकिन हकीकत यही है कि राजनेताओं के वादों के पीछे छिपे खतरनाक इरादों के जटिल गणित को भांप लेना हर किसी के बूते की बात नहीं। 
सिटिंग सांसद या विधायक, चुनाव में टिकट का जुगाड़ होते ही जनता-रूपी प्रेमिका को रिझाने के लिए आठवें सुर में गाता है- वादा करो नहीं छोड़ोगी तुम मेरा साथ़...।  अब वादे वफा हों या नहीं, लेकिन उनका एतबार करना, चाहे प्रेमी हों या चुनावी वैतरणी में फंसी जनता, दोनों की ही कमजोरी है। अंततोगत्वा, हर बार की तरह, धोखा खाने के बाद मन्ना डे के स्वर में स्वर मिलकर कस्मे वादे प्यार वफा सब बातें हैं बातों का क्या ... या किशोर कुमार के साथ वादा तेरा वादा, वादा पे तेरे मारा गया, बंदा मैं सीधा-साधा... गाना या फिर रफी साहब के साथ मिलकर सवाल पूछना क्या हुआ तेरा वादा ़... यही तो नियति है जनता-जनार्दन की।
    

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column 16 april