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चुनावी शोर के बाद का सन्नाटा

जीवन में रिक्तता है, सन्नाटा है। कल का कानफोड़ू शोर नदारद है। कुछ मानते हैं कि चुनाव-प्रचार जितना घटिया होता है, उतना ही लोकप्रिय। आसमान से उतरे सियासी व  फिल्मी सितारे फिर से ईद का चांद बनने वाले हैं। यही क्या कम है कि एक बार दर्शन दे दिए, गरीबी हटाने, भ्रष्टाचार मिटाने, किसानों के कर्ज माफ करने जैसे वादे दोहराकर। वह भी धूप-गरमी झेलकर। करोड़ों के स्वामी, सतत वातानुकूलन के आदी, तपती लू और जलती भट्ठी जैसे सूरज के ताप में कितना त्याग कर रहे हैं। कभी निर्धन बच्चों को सांस रोककर दुलराते हैं, कभी वृद्धों के पैर पड़ते हैं। 
जब जनसेवा को मिशन माना है, तो सेवा धर्म निभाना ही होगा। जैसे धंधे में कोई सुख-चैन भूले, वैसे ही यह जन-कल्याण में शारीरिक कष्ट और असुविधा भूल जाते हैं। भीड़ उमड़ती है, जब वह अपनी रथनुमा सवारी से कार के ‘वाइपर’ के समान हाथ हिलाते हैं। किसी को क्या खबर कि उनके हाथ हिलते-हिलते दुखने लगे हैं और जुबान अर्थहीन बकवास करते-करते। वह तो दिमागी मासूमियत के कारण स्वस्थ हैं, वरना कब के बिस्तर पकड़ते? भीड़ देखकर उन्हें विटामिन ‘पी’ यानी पावर का आभास होता है। चेहरा चमकता है प्रसन्न्ता से या पसीने से? जानकारों का आकलन है कि भीड़ का वोट में तब्दील होना कोई निश्चित नहीं है? कुछ नेता को देखने की उत्सुकता से आए हैं, अधिकतर पैसे-पूड़ी के प्रलोभन से। जनता जानती है कि आदर्श-उसूल बस दिखाने के हाथी के दांत हैं। भाषणों की शोभा हैं, स्वार्थ के खाने-चबाने के दांत और हैं। 
सबका सीमित और इकलौता लक्ष्य सत्ता है। एक ऐसी ही हस्ती का दावा है कि उसने नीतिगत निर्णयों से करप्शन का उन्मूलन कर दिया है। उनके एक प्रशंसक का भोगा हुआ त्रासद यथार्थ है कि ‘चाहे वह कुछ भी कहें, हम कैसे मान लें?’ वह अभी विकास प्राधिकरण से निराश लौटे हैं। इस सूचना के साथ कि घूस की रेट अब दोगुनी हो गई है, कुछ मुद्रास्फीति से, और कुछ पकडे़ जाने पर सजा की   सरकारी नीति से। 

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column 13 may