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समझाओ तो वह खुद उड़ जाते हैं

टीम सेमीफाइनल में पहुंच गई, पर नहीं जीत पाई। जीत जाती, तो फाइनल में पहुंच जाती। फाइनल भी जीतती, तो कुछ दिन कप जीतने की खुमारी में कट जाते। लेकिन बिना पूर्व-सूचना के एक सुनामी ने पूरे देश को लपेटे में ले लिया। जिसे देखो खौफ में है, ‘जाने क्या होगा आगे रे’। सोच-सोचकर दिल बैठा जा रहा है। पहले चुनाव और आईपीएल की डबल डोज, फिर वल्र्ड कप, समय कैसे कट गया, पता ही नहीं लगा। अब लग रहा है, जैसे समय डराने की मुद्रा में काटने के लिए मुंह फाड़े बैठा है। कैसे कटेगा आने वाला समय, यह सोच-सोचकर आम जनता खौफ में है, लेकिन किसी को परवाह ही नहीं है। 
समय काटने के कई सारे नए ख्याल मन में आ रहे हैं, लेकिन कोई दो-चार दिन से ज्यादा टिकाऊ  समय-काट आइडिया नहीं आ रहा। आजकल पड़ोसियों से इतना संबंध नहीं रहा कि दो-चार दिन की लड़ाई से ज्यादा के मुद्दे तलाश किए जा सकें। कुछ दिन दुखियों की सेवा के नाम पर भी आजकल समाज की वाह-वाही पाना आसान नहीं रहा। बरसात में सड़कें भी नहीं बन रहीं कि जेसीबी देखकर समय काटा जा सके। बही-खाता देख आम बंदे की स्थिति वैसी ही हो जाती है, जैसे किसी फाइव स्टार रेस्तरां में खाने का मैन्यू देख हो जाती है। बेचारे को रेट के अलावा कुछ समझ नहीं आता और उसमें भी संशय यह रहता है कि पूरे खाने का रेट है या सिर्फ एक सब्जी का। यही वह समय है, जब देश में खाली लोगों के एक आधिकारिक संगठन की कमी महसूस होती है। 
लोग टेलीफोन कंपनी से तंग आ गए हैं कि उनकी कॉल अक्सर ड्रॉप हो जाती है। कई बार तो दूसरी तरफ घंटी जाते ही फोन कट जाता है। अब ऐसे लोगों को कंपनियां कैसे समझाएं कि आप नहीं, लोग आपसे तंग आ चुके हैं। जरूरी तो नहीं कि उनका समय भी न कट पा रहा हो। ऐसे भी लोग इसी दुनिया में हैं, जिनका समय पंख लगाकर उड़ रहा होता है, लेकिन अगले को ऐसी बात समझाओ, तो वह खुद उड़ जाते हैं, फुर्र।

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  • Web Title:Nashtar Hindustan Column 12 july