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हम तो हंसेंगे डंके की चोट पर

हम जब बच्चे थे, तो परिवार बहुत बड़े हुआ करते थे। तब परिवार के तमाम लोगों का एक-दूसरे पर हक होता था, यानी कोई भी किसी के बच्चे को थप्पड़ जड़ सकता था। ऐसे में, बच्चे अक्सर उन लोगों से भी पिट चुकते थे, जिन्हें वे ठीक से पहचानते भी नहीं थे। आमतौर पर पीटने वाले बुजुर्ग दूर से ही पहचान में आ जाते थे। उनके चेहरे पर एक सख्त और गंभीर भाव होता था। हंसने को वह दांत निपोरना कहते थे। कोई बच्चा हंसते हुए दिख जाता, तो उन्हें गुस्सा आ जाता। उनका मानना था कि सच्चरित्र और सदाचारी बच्चे कभी नहीं हंसते, जबकि बचपन में बच्चे बिना बात के घंटों पेट पकड़कर हंस सकते हैं। ऐसे में, इन जैसे बुजुर्गों के अचानक दिख जाने पर हंसी रोकना बिना ब्रेक की साइकिल को रोकने जैसा होता था।

इसी तरह स्कूलों में भी कुछ मास्टर ऐसे होते थे, जिनके सीने पर हंसते-खेलते बच्चे को देखकर सांप लोट जाता था। उन्हें कोई बच्चा मुस्कराता भी दिख जाए, तो वे डांट लगाते थे- क्यों दांत दिखा रहे हो? उनका प्रिय शगल किसी मुस्कराते हुए बच्चे के पीछे से चुपचाप उसे थप्पड़ जड़ना होता था। इन मास्टरों की भी ख्याति स्कूल में ही नहीं, सारे शहर में पीटने के लिए होती थी। स्कूल की पहचान भी उन्हीं से होती थी। 

अगर हम जैसे गुमनाम लोगों का कोई इतिहास है, तो वह गवाह है कि इन सबके बावजूद हमने हंसना नहीं छोड़ा या यूं कहें कि ऐसे सारे अत्याचार हमने हंसते-हंसते झेले। तब से जो हंसने की आदत हमने बचाकर रखी, वह आज तक कायम है। यह सारा इतिहास बयान करने का उद्देश्य यह है कि जो फालतू संवेदनशीलता और भावनाओं का आहत होना दिखाकर लोगों को मजाक करने से रोक रहे हैं, जो मजाक करने वालों पर देशद्रोह तक के केस कर रहे हैं, उनसे डरकर हम हंसना कतई नहीं छोड़ेंगे। यह भी क्या बात हुई कि आप हर चीज को मजाक बना दें और हम उन पर  हंसे भी नहीं। 

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  • Web Title:Nashtar Column in daily Hindustan on 30 august