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मेवाकाल में सेवा करने वालों से डर

मुझे सेवा करने और करवाने, दोनों से डर लगता है। करने से इसलिए कि उसमें मेहनत लगती है और आलस्य की हानि होती है। सेवा करवाने से डर इसलिए लगता है, क्योंकि उसके लिए जैसा आत्मविश्वास चाहिए, वह मुझमें नहीं है। जब कोई मेरे पैर छूने को झुकता है, तो मुझे लगता है कि यह जरूर मेरी टांग खींचने वाला है। सेवा करवाने का आत्मविश्वास जिन लोगों में होता है, वे चलते वक्त भी पैर ऐसे बढ़ाते हैं, जैसे पांव छूने का आमंत्रण दे रहे हों। वे बैठते हैं, तो कुछ इस अंदाज में जैसे पांव दबाने के इच्छुक लोगों के लिए ही बैठे हों। 

डरने की एक वजह यह भी है कि सेवा करने के इच्छुक और तत्पर लोगों के प्रति मेरे मन में हमेशा ही कुछ न कुछ संदेह रहता है। मुझे यही लगता है कि पांव दबाने वाले लोगों का असली इरादा बहुत कुछ और दबाने का होता है। मुझे वे मंदिर जाने वाले उन लोगों की तरह दिखते हैं, जो वास्तव में जूते या भगवान को चढ़ाए गए पैसे चुराने के लिए वहां जाते हैं।

इन दिनों यह ख्याल आने की एक बड़ी वजह यह है कि सितंबर में हिंदी सेवा की बडी धूमधाम रहती है। तमाम सरकारी दफ्तरों में हिंदी पखवाड़ा, हिंदी सप्ताह आदि की चहल-पहल रहती है। हिंदी के सेवियों की इन दिनों बड़ी व्यस्तता होती है, वे अमुक विभाग के सचिव और तमुक कार्यालय के उप-महानिदेशक से लिफाफा लेकर और शॉल ओढ़कर मोर की तरह यहां-वहां फुदकते दिख जाते हैं। जो ज्यादा बड़े सेवी हैं, वे तो विश्व हिंदी सम्मेलन में जाकर सेवा कर आते हैं।

हमने सुना है कि गांधीजी के जमाने में सचमुच सेवा होती थी, क्योंकि खुद गांधीजी ने ही इसका उदाहरण पेश किया था। अब तो ऐसा लगता है कि अपने सेवकों को देखकर हमारी भाषा हिंदी को भी वैसा ही लगता होगा, जैसा हम जैसे अदना हिंदी वालों को लगता है। लेकिन क्या कर सकते हैं? 

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  • Web Title:Nashtar Column in daily Hindustan on 13 september