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धनबल-बाहुबल से बड़ा छलबल

छलबल के सहारे आज अमेरिका मोगांबो बना हुआ है। दुनिया के सिर में दर्द की तरह। रावण अगर छलबल न करता, तो रामायण पूरी ही न होती। वैसे भी बड़े लोग विरोधियों की परवाह नहीं करते। उन्हें पता है कि उन पर फेंका हुआ ढेला तालाब में हल्की हलचल पैदा करके शीघ्र ही घुलकर नष्ट हो जाता है। 

कथनी और करनी में अगर भेद न हो, तो कोई माई का लाल चुनाव नहीं जीत सकता। यह सबको पता है कि पुराने पाप ब्याज नहीं देते। इसीलिए नित नए करने पड़ते हैं। जो जनता को रुला नहीं सकता, उसे प्याज नहीं कहते और जो जनता का कलेजा न जला सके, उसे पेट्रोल नहीं कहते। राजनीति अगर भले घर की कन्या होती, तो आजादी मिलने के तुरंत बाद देश में रामराज आ जाता। अपने इस नुकसान के लिए हम पाकिस्तान को गाली दे सकते हैं। अच्छे दिन तो तभी आएंगे, जब बुरे दिनों का कोटा पूरा हो जाए। वैसे, बुरे दिन आदत में शुमार हो जाएं, तो वे उतने बुरे नहीं लगते। वैसे यह भी ठीक है कि कुछ पढ़े-लिखे लोग ऐसे भी होते हैं कि अच्छी से अच्छी तालीम उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती। जिस मुरगे को यह मालूम हो कि उसे आधे घंटे के बाद कटना है, वह बांग नहीं दे पाता। आजकल तो अभिमन्यु चक्रव्यूह तोड़ने की कला गूगल से सीख लेता है। 

कुछ नेताओं पर जनता की भलाई करने का आरोप लगता रहता है। वे भी इस आरोप को अभियोग की तरह लेते हैं। राजनीति तो हमें यही सिखाती है कि वेज बिरयानी से अच्छा है कि घास-फूस खा लो। आज की बियर और शराब में भी तो विटामिन होते हैं। राजनीति के अर्जुन भले ही सेवामुक्त हो जाएं, लेकिन कृष्ण कभी रिटायर नहीं होते। पहले मजबूरी का नाम किसी आदरणीय के नाम पर था, अब मजबूरी का नाम मतदाता है। वह उसी की खाता है। आज की राजनीति तो यह है कि नेता लोग आसमान में पतंगें उड़ाते रहते हैं और जनता चरखी पकडे़ रहती है। 

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  • Web Title:Nashtar Column in daily Hindustan on 08 september